भारत में अंडे और चिकन की खुदरा कीमतों में सालाना आधार पर **35% से 40%** की भारी बढ़ोतरी हुई है। इसकी मुख्य वजह मक्का और सोयाबीन फीड की आसमान छूती कीमतें हैं। मार्जिन बचाने के लिए इंडस्ट्री ने प्रोडक्शन में **25%** की कटौती की है, जिससे सप्लाई चेन पर गहरा असर पड़ा है।
भारत में अंडे और चिकन की कीमतों में आई यह तेजी कोई सामान्य मौसमी बदलाव नहीं है, बल्कि यह पोल्ट्री इंडस्ट्री के सामने खड़े एक बड़े संकट का संकेत है। पोल्ट्री की कुल ऑपरेशनल कॉस्ट का 70% हिस्सा सिर्फ फीड (दाना) पर खर्च होता है, जो अब बेकाबू हो चुका है।
मक्के की कमी और एथेनॉल का कनेक्शन
इस संकट की जड़ मक्का और सोयाबीन मील की कीमतों में हुई जबरदस्त बढ़ोतरी है। डेटा के अनुसार, देश में पैदा होने वाले कुल मक्के का करीब 37% हिस्सा अब एथेनॉल डिस्टिलरीज को डायवर्ट किया जा रहा है, ताकि सरकार के बायोफ्यूल ब्लेंडिंग लक्ष्यों को पूरा किया जा सके। इस डिमांड-सप्लाई मिसमैच ने पोल्ट्री फीड बनाने वालों के लिए कच्चे माल की किल्लत पैदा कर दी है।
प्रोडक्शन में बड़ी कटौती
जून 2026 में 'ऑल इंडिया पोल्ट्री ब्रीडर्स एसोसिएशन' और अन्य इंडस्ट्री बॉडीज ने घाटे को कम करने के लिए प्रोडक्शन में 25% की बड़ी कटौती का फैसला लिया। इसमें पैरेंट ब्रीडर स्टॉक्स की छंटनी (culling) भी शामिल है, जो पोल्ट्री सप्लाई चेन की नींव होते हैं। चूंकि इन पक्षियों को पालने के बजाय नष्ट कर दिया गया, इसलिए सप्लाई में पैदा हुआ यह कृत्रिम गैप आने वाले महीनों में भी कीमतों को ऊंचा बनाए रख सकता है।
पर्यावरण और किसानों पर मार
2026 के दौरान भीषण गर्मी और अनियमित मॉनसून ने भी पक्षियों की उत्पादकता को प्रभावित किया है, जिससे मृत्यु दर बढ़ी है। छोटे पोल्ट्री किसानों के लिए, जिनके पास पूंजी का अभाव है, यह स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण हो गई है। कई फार्म्स ने अपनी क्षमता घटा दी है या पूरी तरह से कामकाज बंद कर दिया है।
आने वाले सर्दियों के सीजन में, जब पोल्ट्री उत्पादों की मांग आमतौर पर बढ़ जाती है, कीमतों पर और दबाव देखने को मिल सकता है। निवेशकों और बाजार के जानकारों की नजर अब मक्के की कीमतों और सरकारी अनाज आवंटन नीतियों पर टिकी है।
