भारत का एडिबल ऑयल इंपोर्ट 2025-26 ऑयल ईयर के शुरुआती 11 महीनों में **3.27%** बढ़कर **151.64 लाख टन** पहुंच गया है। रिफाइनर्स अब तैयार तेल के बजाय क्रूड ऑयल पर ज्यादा जोर दे रहे हैं, लेकिन ग्लोबल महंगाई और गिरता रुपया मुनाफे पर दबाव डाल सकता है।
भारत का एडिबल ऑयल इंपोर्ट वॉल्यूम 2025-26 ऑयल ईयर के पहले 11 महीनों में 3.27% की तेजी के साथ 151.64 लाख टन दर्ज किया गया है। पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 146.83 लाख टन था, जो ग्लोबल मार्केट पर भारत की बढ़ती निर्भरता को दिखाता है।
क्रूड ऑयल प्रोसेसिंग की ओर झुकाव
इस साल का सबसे बड़ा बदलाव रिफाइंड एडिबल ऑयल के इंपोर्ट में आई भारी गिरावट है, जो पिछले साल के 16.89 लाख टन से गिरकर 7.40 लाख टन रह गया है। इसका मतलब है कि भारतीय रिफाइनर्स अब विदेशों से तैयार माल मंगाने के बजाय खुद क्रूड ऑयल को प्रोसेस करने को प्राथमिकता दे रहे हैं। वहीं, क्रूड ऑयल का इंपोर्ट बढ़कर 144.23 लाख टन हो गया है, जो रिफाइनिंग कंपनियों की क्षमता उपयोग (capacity utilization) के लिए एक अच्छा संकेत है।
पाम ऑयल का दबदबा और चुनौतियां
पाम ऑयल भारत की पहली पसंद बना हुआ है, जिसका इंपोर्ट 5.32% बढ़कर 73.52 लाख टन तक पहुंच गया है। अर्जेंटीना सोयाबीन और सूरजमुखी तेल के प्रमुख सप्लायर के रूप में उभरा है, जबकि मलेशिया और इंडोनेशिया पाम ऑयल के मुख्य स्रोत बने हुए हैं। हालांकि, नेपाल से आने वाला ड्यूटी-फ्री रिफाइंड तेल भारतीय रिफाइनर्स के लिए बड़ी चुनौती पेश कर रहा है, क्योंकि दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार समझौता (SAFTA) के तहत यह तेल बिना किसी शुल्क के आता है, जिससे घरेलू कंपनियों को प्राइस वॉर का सामना करना पड़ता है।
करेंसी और कमोडिटी की मार
इंपोर्ट वॉल्यूम के साथ-साथ अब घरेलू फूड प्रोसेसिंग कंपनियों पर दोहरा दबाव है। सितंबर 2026 तक, ग्लोबल लेवल पर सूरजमुखी तेल की कीमतें 10.8% बढ़कर $1,432 प्रति टन और सोयाबीन तेल 11.2% बढ़कर $1,314 प्रति टन हो गई हैं।
ऊपर से भारतीय रुपये की कमजोरी, जो 88.32 से गिरकर 95.51 के स्तर पर आ गई है, इंपोर्ट को और महंगा बना रही है। निवेशकों के लिए अब सबसे बड़ी चिंता यह है कि क्या कंपनियां बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों पर डाल पाएंगी या उन्हें अपने मार्जिन के साथ समझौता करना पड़ेगा, जिसका सीधा असर आने वाली तिमाही के नतीजों पर दिख सकता है।
