भारत में जुलाई महीने में खाद्य तेलों का आयात **34%** बढ़कर **14.9 लाख टन** पर पहुंच गया। आगामी त्योहारी सीजन के लिए रिफाइनरी कंपनियों ने स्टॉक बढ़ाया है।
खाद्य तेल आयात में 10 महीने की ऊंचाई
भारत में खाद्य तेलों का आयात जुलाई में 10 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। आयात 34% की भारी बढ़ोतरी के साथ 14.9 लाख टन रहा। यह उछाल स्थानीय रिफाइनरी कंपनियों द्वारा त्योहारी सीजन की तैयारी के लिए स्टॉक बढ़ाने की रणनीति का नतीजा है। भारत, दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य तेल आयातक होने के नाते, इस खरीददारी से वैश्विक कीमतों और सप्लाई ट्रेंड को प्रभावित कर सकता है।
पाम और सोया तेल की जोरदार मांग
जून की तुलना में पाम तेल का आयात 50% बढ़कर 7.33 लाख टन पर पहुंच गया, जो पिछले पांच महीनों का उच्चतम स्तर है। सोया तेल का आयात 32% बढ़कर 5.01 लाख टन रहा, जबकि सूरजमुखी तेल का आयात 4% बढ़कर 2.53 लाख टन दर्ज किया गया। यह दिखाता है कि भारत मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया से पाम तेल, और अर्जेंटीना, ब्राजील, रूस और यूक्रेन जैसे देशों से सोया और सूरजमुखी तेल पर निर्भर है।
निवेशकों के लिए, यह ट्रेंड घरेलू कंपनियों पर वैश्विक कमोडिटी साइकल्स के प्रभाव को उजागर करता है। कई भारतीय खाद्य तेल रिफाइनरी और एफएमसीजी कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कीमतों और आयात शुल्कों में उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील हैं। आयात बढ़ने से कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ सकती है, लेकिन अगर वैश्विक कीमतें अस्थिर रहती हैं या घरेलू खुदरा कीमतों में आनुपातिक वृद्धि नहीं हो पाती है, तो कंपनियों के मार्जिन पर दबाव आ सकता है।
मांग को प्रभावित करने वाले कारक
त्योहारी मांग के अलावा, इस उछाल का एक अहम कारण घरेलू तिलहन का उत्पादन कम होना भी है। स्थानीय रेपसीड और सोयाबीन की फसल की कम पिसाई के कारण, मांग-आपूर्ति के अंतर को पाटने के लिए आयात पर निर्भरता बढ़ी है। उद्योग के अनुमान बताते हैं कि प्रतिस्पर्धी वैश्विक कीमतों के कारण सितंबर तक सोया तेल का आयात 5 लाख टन से ऊपर बने रहने की संभावना है।
हालांकि बढ़ा हुआ आयात घरेलू उपलब्धता सुनिश्चित करता है, यह दर्शाता है कि स्थानीय खिलाड़ी अपने वर्किंग कैपिटल को सावधानीपूर्वक प्रबंधित कर रहे हैं। कंपनियां पीक ग्लोबल प्रोक्योरमेंट की अवधि के दौरान उच्च-मात्रा वाले इन्वेंट्री में फंड फंसा रही हैं। निवेशक अगले दो तिमाहियों में इस इन्वेंट्री बिल्ड का प्रमुख सूचीबद्ध कंपनियों के कैश फ्लो पर पड़ने वाले प्रभाव पर नज़र रख सकते हैं। इसके अतिरिक्त, कच्चे और परिष्कृत तेलों पर सरकारी व्यापार नीति में कोई भी बदलाव इन आयात-भारी व्यापार मॉडल की लाभप्रदता को बदल सकता है।
