वित्तीय वर्ष 2026 में भारत ने कोकिंग कोल के आयात पर होने वाले खर्च में भारी कटौती की है। यह खर्च पिछले तीन सालों के मुकाबले लगभग 39% कम होकर $11.76 बिलियन डॉलर पर आ गया है। इस कमी की मुख्य वजह ऑस्ट्रेलिया के बजाय रूस और अमेरिका जैसे देशों से सस्ते कोयले की खरीद को बढ़ावा देना है।
Detailed Coverage
आयात के खर्च में आई बड़ी गिरावट
भारतीय स्टील इंडस्ट्री के लिए एक बड़ी राहत की खबर है। कोकिंग कोल, जो कि स्टील बनाने के लिए एक ज़रूरी कच्चा माल है, उसके आयात पर भारत का खर्च वित्तीय वर्ष 2026 में काफी कम हो गया है। आंकड़ों के मुताबिक, यह खर्च घटकर $11.76 बिलियन डॉलर रह गया है, जो कि वित्तीय वर्ष 2023 में $19.2 बिलियन डॉलर था। यह लगभग 39% की बड़ी गिरावट है।
ऑस्ट्रेलिया से दूरी, रूस-US से दोस्ती
इस बड़े बदलाव की सबसे खास वजह है भारतीय स्टील कंपनियों का ऑस्ट्रेलिया से कोयला खरीदना कम करना। पहले ऑस्ट्रेलिया प्रीमियम कोकिंग कोल का मुख्य सप्लायर था, लेकिन अब कंपनियां रूस और अमेरिका जैसे देशों से सस्ता कोयला खरीद रही हैं।
- ऑस्ट्रेलिया: FY23 में जहां ऑस्ट्रेलिया से $10.63 बिलियन का कोयला आयात हुआ था, वहीं FY26 में यह घटकर $5.1 बिलियन रह गया। आयात की मात्रा भले ही 9.24% कम हुई हो, लेकिन खर्च में आई भारी कमी बताती है कि कंपनियों ने बेहतर डील की हैं या सस्ते सप्लायर चुने हैं।
- रूस: रूस से कोकिंग कोल का आयात दोगुना होकर 9 मिलियन टन तक पहुंच गया है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतनी ज्यादा मात्रा के बावजूद, कुल आयात मूल्य में सिर्फ 6.25% की बढ़ोतरी हुई है और यह $1.23 बिलियन रहा। यह साफ दिखाता है कि रूस से मिल रही भारी छूट का फायदा उठाया गया है।
- अमेरिका: अमेरिका भी अब एक बड़ा सप्लायर बन गया है। FY26 में अमेरिका से कोकिंग कोल का आयात 36% से बढ़कर 9.90 मिलियन टन हो गया है।
ग्लोबल कीमतें और नई टेक्नोलॉजी का असर
इन सप्लायर बदलावों के साथ-साथ, ग्लोबल मार्केट में कोयले की कीमतों में आई नरमी का भी असर दिख रहा है। 2023 की ऊंचाई से $172.8 प्रति मीट्रिक टन पर चल रहे ऑस्ट्रेलियाई बेंचमार्क दाम जून 2026 तक घटकर करीब $138.5 प्रति मीट्रिक टन पर आ गए हैं।
इसके अलावा, भारतीय स्टील इंडस्ट्री ने 'Pulverized Coal Injection (PCI)' जैसी नई टेक्नोलॉजी को भी अपनाया है। इस टेक्नोलॉजी की मदद से ब्लास्ट फर्नेस में सीधे कोयले का पाउडर इस्तेमाल किया जाता है, जिससे महंगे कोक की जरूरत कम हो जाती है और प्रोडक्शन कॉस्ट घटती है।
भविष्य की चुनौतियाँ
ये सारे कदम स्टील कंपनियों के लिए बड़ी राहत लेकर आए हैं। लेकिन, भारत में घरेलू कोकिंग कोल का भंडार ज्यादातर निम्न गुणवत्ता का है, जिसे प्रोसेस करना महंगा पड़ता है। इसलिए, बड़ी मात्रा में हाई-ग्रेड कोयले के लिए भारत अभी भी आयात पर निर्भर है।
इसका मतलब है कि भारतीय स्टील निर्माता अभी भी अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव, शिपिंग खर्च और भू-राजनीतिक जोखिमों के प्रति संवेदनशील रहेंगे। निवेशकों को यह देखना होगा कि यह कच्चे माल की लागत स्टील कंपनियों के मुनाफे पर कितना असर डालती है।
