सोयाबीन के आयात पर कस्टम विभाग की जांच के कारण सप्लायर्स को **11,000 मीट्रिक टन** माल भारत से दूसरी जगहों पर भेजना पड़ा है। **45%** की संभावित इंपोर्ट ड्यूटी और कानूनी पेच से बचने के लिए इम्पोर्टर्स खेप रिजेक्ट कर रहे हैं, जिससे घरेलू ऑयल मिलर्स के लिए कच्चा माल जुटाना मुश्किल हो गया है।
क्या है पूरा मामला?
देश के ऑयल मिलर्स और ट्रेडर्स इस वक्त बड़ी सप्लाई चेन बाधाओं से जूझ रहे हैं। कस्टम विभाग नाइजर (Niger) से आने वाले सोयाबीन के सोर्स की जांच कर रहा है। अधिकारियों को शक है कि नाइजर में इतना उत्पादन नहीं होता, जितना वहां से भारत भेजा जा रहा है। जांच का मुख्य केंद्र यह है कि क्या ड्यूटी बचाने के लिए माल को गलत तरीके से 'मिसलेबल' (mislabeled) किया गया है।
सप्लायर्स और मिलर्स पर असर
इस सख्ती के कारण इम्पोर्टर्स ने 45% तक के भारी इंपोर्ट टैरिफ से बचने के लिए माल लेना बंद कर दिया है। इसका नतीजा यह हुआ कि सप्लायर्स को 11,000 मीट्रिक टन सोयाबीन वियतनाम, इंडोनेशिया और बांग्लादेश जैसे देशों में डायवर्ट करना पड़ा है। इस फेरबदल के कारण सप्लायर्स को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है, क्योंकि $650 प्रति टन की शुरुआती कीमत के मुकाबले अब यह माल दूसरे बाजारों में $470 से $510 प्रति टन के बीच बिक रहा है।
पोर्ट्स पर फंसा माल
जवाहरलाल नेहरू पोर्ट (JNPT) जैसे बड़े बंदरगाहों पर अभी भी लगभग 1,500 टन सोयाबीन अटका हुआ है, जिस पर भारी डेमरेज चार्जेस (demurrage charges) लग रहे हैं। भारत ने इस साल रिकॉर्ड 10 लाख मीट्रिक टन सोयाबीन का आयात किया है, क्योंकि घरेलू फसल का उत्पादन उम्मीद से कम रहा था।
अब बाजार की नजर इस बात पर है कि क्या सरकार डॉक्यूमेंटेशन स्टैंडर्ड्स को लेकर कोई स्पष्ट निर्देश जारी करेगी या यह संकट और गहराएगा। निवेशकों और एग्री-सेक्टर से जुड़े लोगों को अब घरेलू कच्चा माल महंगा होने और ऑयल मिलर्स के मार्जिन पर पड़ने वाले असर पर पैनी नजर रखनी होगी।
