साल 2026-27 के लिए भारत के कॉटन ओपनिंग स्टॉक ने 93.59 लाख गांठों का ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाया है। यह बड़ी वृद्धि 62 लाख गांठों के अभूतपूर्व आयात की वजह से हुई है। सरकार की ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट विंडो ने टेक्सटाइल निर्माताओं को राहत दी है, लेकिन निवेशकों को डाउनस्ट्रीम डिमांड और ग्लोबल प्राइस की अस्थिरता पर नजर रखनी चाहिए।
कॉटन सेक्टर में बड़ा बदलाव
साल 2026-27 के सीजन के लिए भारत के कॉटन ओपनिंग स्टॉक्स ने 93.59 लाख गांठों का एक नया रिकॉर्ड बनाया है। कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक, यह 2025-26 सीजन के 55.59 लाख गांठों से 68% ज्यादा है। इस स्टॉक में बढ़ोतरी की मुख्य वजह 62 लाख गांठों का अब तक का सबसे बड़ा इंपोर्ट है, जो ऐतिहासिक सालाना औसत 15 से 20 लाख गांठों से काफी ज्यादा है।
ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट का असर
आयात में इस उछाल को सरकार की उस पॉलिसी से बढ़ावा मिला, जिसने 1 जून 2026 से 31 अक्टूबर 2026 तक कॉटन पर कस्टम ड्यूटी माफ कर दी थी। इस कदम का मकसद डोमेस्टिक टेक्सटाइल मिल्स को कच्चे माल की सप्लाई सुनिश्चित करना था। वर्धमान टेक्सटाइल्स (Vardhman Textiles), इंडो काउंट इंडस्ट्रीज (Indo Count Industries) और रेमंड लाइफस्टाइल (Raymond Lifestyle) जैसी लिस्टेड टेक्सटाइल कंपनियों को कच्चे माल की बढ़ी हुई उपलब्धता से मार्जिन में राहत मिली। आमतौर पर, कच्चे माल की कम लागत से स्पिनिंग और टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन में सुधार होता है, और इसी वजह से ड्यूटी-फ्री विंडो के ऐलान के बाद जून 2026 की शुरुआत में इन स्टॉक्स में तेजी देखी गई थी।
आगे की राह और जोखिम
हालांकि, टेक्सटाइल वैल्यू चेन के लिए आगे का रास्ता मिला-जुला नजर आ रहा है। जहां स्पिनर्स को बढ़ी हुई सप्लाई से फायदा हुआ है, वहीं फैब्रिक और निटिंग मैन्युफैक्चरर्स जैसी डाउनस्ट्रीम यूनिट्स को ग्राहकों पर लागत बढ़ाना मुश्किल हो रहा है। डोमेस्टिक डिमांड कमजोर है और एक्सपोर्ट मार्केट में भी नरमी के संकेत हैं, जिससे वैल्यू चेन में एक डिस्कनेक्ट पैदा हो रहा है। अगर ये डाउनस्ट्रीम यूनिट्स अपने तैयार माल को प्रभावी ढंग से नहीं बेच पाती हैं, तो स्पिनर्स को मिले मार्जिन बेनिफिट्स पूरे सेक्टर के लिए लॉन्ग-टर्म प्रॉफिट ग्रोथ में तब्दील नहीं हो पाएंगे।
निवेशकों को इंडस्ट्री से जुड़े एक्सटर्नल रिस्क पर भी ध्यान देना चाहिए। इंपोर्टेड कॉटन पर निर्भरता कंपनियों को ग्लोबल ICE कॉटन फ्यूचर्स और करेंसी के उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील बनाती है। अगर इसे ठीक से मैनेज न किया जाए, तो सस्ते कच्चे माल के फायदे खत्म हो सकते हैं। इसके अलावा, कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव और इंटरनेशनल मार्केट्स में प्रॉफिट-टेकिंग के कारण ग्लोबल कॉटन की कीमतों में भी अस्थिरता देखी गई है।
अगले बड़े फैक्टर
सेक्टर के लिए अगला महत्वपूर्ण फैक्टर डोमेस्टिक क्रॉप की स्थिति होगी, जैसे-जैसे खरीफ सीजन आगे बढ़ेगा। मॉनसून के पूर्वानुमान महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि औसत से कम बारिश होने पर डोमेस्टिक यील्ड्स खतरे में पड़ सकती हैं और अगले सीजन के लिए सप्लाई की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा, ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट विंडो के अक्टूबर 2026 में बंद होने के साथ, मार्केट पार्टिसिपेंट्स साल के अंत तक टेक्सटाइल प्लेयर्स की कॉस्ट स्ट्रक्चर को सीधे प्रभावित करने वाली इंपोर्ट ड्यूटीज के बारे में सरकार की ओर से किसी भी नए ऐलान पर नजर रखेंगे।
