कॉपर की डिमांड में बंपर उछाल! 2030 तक 30 लाख टन पार, इंफ्रा का बड़ा सहारा

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
कॉपर की डिमांड में बंपर उछाल! 2030 तक 30 लाख टन पार, इंफ्रा का बड़ा सहारा

भारत में कॉपर की मांग हर साल **9%** से ज्यादा की रफ्तार से बढ़ रही है। इंफ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी प्रोजेक्ट्स इस मांग को बढ़ावा दे रहे हैं। लेकिन, अब भारत कॉपर का नेट इंपोर्टर (Net Importer) बन गया है, ऐसे में इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स घरेलू स्मेल्टिंग क्षमता (Smelting Capacity) बढ़ाने की मांग कर रहे हैं ताकि सप्लाई की कमी को पूरा किया जा सके।

2030 तक 30 लाख टन का आंकड़ा पार

आने वाले समय में भारत में कॉपर की खपत लगातार बढ़ेगी। अनुमान है कि इस दशक के अंत तक यह 9% से 9.5% की सालाना दर से बढ़कर 30 लाख टन तक पहुंच सकती है। इसकी मुख्य वजह देश में तेजी से चल रहे इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट, जैसे एयरपोर्ट और अस्पतालों का विस्तार, और क्लीन एनर्जी व इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (Electric Vehicles) की तरफ बढ़ता झुकाव है। इन सेक्टर्स में भारी मात्रा में बिजली के तार और कंपोनेंट्स की जरूरत पड़ती है, इसलिए शुद्ध कॉपर (Refined Copper) की मांग पर फोकस बढ़ रहा है।

इंपोर्ट पर निर्भरता बढ़ी, इंपोर्ट बिल 10 अरब डॉलर के पार

साल 2018 में वेदांता (Vedanta) के तमिलनाडु स्थित कॉपर प्लांट के बंद होने के बाद से घरेलू सप्लाई में बड़ा बदलाव आया है। पहले भारत कॉपर का एक्सपोर्टर (Exporter) था, लेकिन अब अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए भारी मात्रा में इंपोर्ट पर निर्भर है। फाइनेंशियल ईयर 2025 में भारत ने करीब 1.9 मिलियन टन कॉपर का इस्तेमाल किया, जो पिछले साल के मुकाबले 9.3% ज्यादा है। इस मांग को पूरा करने के लिए देश ने 5,20,000 टन से ज्यादा रिफाइंड कॉपर प्रोडक्ट्स इंपोर्ट किए, जिनकी कुल कीमत 10 अरब डॉलर से ज्यादा रही। इंपोर्ट पर इस निर्भरता ने इंडस्ट्री के लोगों को नई घरेलू स्मेल्टिंग और रिफाइनिंग फैसिलिटीज (Smelting and Refining Facilities) में तुरंत निवेश करने के लिए प्रेरित किया है।

नई क्षमताएं और नए खिलाड़ी

सप्लाई की कमी को पूरा करने के लिए इंडस्ट्री को हर पांच साल में कम से कम 5,00,000 टन नई क्षमता की जरूरत होगी। साल 2000 से लेकर 2020 की शुरुआत तक बड़े पैमाने पर क्षमता विस्तार के प्रोजेक्ट्स में कमी दिखी थी, लेकिन अब बड़े इंडस्ट्रियल ग्रुप्स इस सेक्टर में नई जान डाल रहे हैं। सरकारी कंपनी हिंदुस्तान कॉपर (Hindustan Copper) अभी भी अपनी माइंस के साथ एकमात्र इंटीग्रेटेड प्रोड्यूसर (Integrated Producer) बनी हुई है, जबकि आदित्य बिड़ला ग्रुप (Aditya Birla Group) का बिड़ला कॉपर (Birla Copper) सबसे बड़ा डोमेस्टिक प्रोड्यूसर (Domestic Producer) है।

हाल के सालों में कई बड़े कॉरपोरेट्स ने भी रुचि दिखाई है। अडानी ग्रुप (Adani Group) ने 2024 में कच्छ कॉपर (Kutch Copper) फैसिलिटी शुरू की है। इसके अलावा, JSW ग्रुप (JSW Group) ने कॉपर माइनिंग में उतरने के संकेत दिए हैं, और Kiri Industries 2027 तक चालू होने वाली एक बड़े स्मेल्टिंग और रिफाइनिंग प्रोजेक्ट पर काम कर रही है।

इन्वेस्टर्स (Investors) के लिए इन प्रोजेक्ट्स की स्पीड पर नजर रखना अहम होगा। इंफ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी पर फोकस के कारण मांग के संकेत मजबूत हैं, लेकिन नए स्मेल्टर्स की फाइनेंशियल वायबिलिटी (Financial Viability) कंपनियों की कैपिटल स्पेंडिंग (Capital Spending) और कच्चे माल की सोर्सिंग (Raw Material Sourcing) पर निर्भर करेगी। बाजार यह देखेगा कि ये प्लान की गई फैसिलिटीज कितनी जल्दी पूरी प्रोडक्शन कैपेसिटी तक पहुंचकर इंपोर्ट पर निर्भरता कम कर पाती हैं।

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