FY26 में भारत में कॉपर की डिमांड बढ़कर **2,100 KT** के स्तर पर पहुंच गई है। इंफ्रास्ट्रक्चर और इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) के बढ़ते चलन ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई है, हालांकि आयातित स्क्रैप पर **42%** की निर्भरता एक चिंता का विषय बनी हुई है।
भारत में औद्योगिक विस्तार के चलते कॉपर (Copper) की खपत में जबरदस्त तेजी देखी गई है। फाइनेंशियल ईयर 2026 में देश की कॉपर डिमांड 12% की बढ़ोतरी के साथ 2,100 KT के आंकड़े को पार कर गई है। यह वृद्धि दर देश की जीडीपी ग्रोथ से भी अधिक है, जो साफ संकेत है कि ग्रीन एनर्जी और ऑटो सेक्टर में कॉपर का महत्व तेजी से बढ़ रहा है।
इंफ्रा और ग्रीन एनर्जी पर जोर
वित्त वर्ष 2026 में कुल कॉपर खपत का 22% हिस्सा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से आया, जिसमें पिछले साल के मुकाबले 29% का इजाफा दर्ज किया गया है। सरकार द्वारा सोलर और विंड एनर्जी पर किए जा रहे खर्च से ग्रिड को मजबूत करने, केबल बिछाने और ट्रांसफॉर्मर बनाने के लिए भारी मात्रा में कॉपर की जरूरत पड़ रही है। भारत ने इस साल 37 GW सोलर और 6 GW विंड एनर्जी क्षमता जोड़ी है, जो कॉपर की मांग को और हवा दे रही है।
इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) का असर
ऑटो सेक्टर में बदलाव का सीधा असर कॉपर की प्रोक्योरमेंट पर दिख रहा है। ऑटो सेक्टर में कॉपर की मांग 14% बढ़ी है। इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV) की बात करें तो इनका मार्केट पेनिट्रेशन 9% रहा, जिसने 37 KT कॉपर की अतिरिक्त मांग पैदा की। एक EV में पारंपरिक इंजन वाली गाड़ियों की तुलना में लगभग 4 गुना अधिक कॉपर इस्तेमाल होता है, इसलिए जैसे-जैसे सड़कों पर इलेक्ट्रिक गाड़ियां बढ़ेंगी, कॉपर की खपत में और बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है।
आपूर्ति का संकट (Supply Risk)
भले ही घरेलू रिफाइंड कॉपर का उत्पादन 23% बढ़कर 704 KT हो गया है, लेकिन हम अभी भी अपनी कुल मांग का सिर्फ 58% ही स्थानीय स्तर पर पूरा कर पा रहे हैं। बाकी 42% जरूरतों के लिए हमें 274 KT कॉपर स्क्रैप का आयात करना पड़ता है। यह आयात पर निर्भरता लंबी अवधि के लिए एक बड़ा रिस्क है। यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्कुलर इकोनॉमी पॉलिसी बदलती है, तो सप्लाई चेन बाधित हो सकती है। निवेशकों के लिए यही सलाह है कि वे देश में रिफाइनिंग और स्मेल्टिंग क्षमता बढ़ाने वाली कंपनियों पर नजर रखें, क्योंकि यही इस निर्भरता को कम करने का एकमात्र रास्ता है।
