भारत में इलेक्ट्रिक व्हीकल्स और इंफ्रास्ट्रक्चर के बढ़ते क्रेज के कारण कॉपर की मांग में भारी उछाल आने वाला है। FY25 में **1.88 मिलियन टन** से बढ़कर यह मांग 2047 तक **10 मिलियन टन** तक पहुंच सकती है।
इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV), रिन्यूएबल एनर्जी और AI इंफ्रास्ट्रक्चर में हो रही तेज ग्रोथ के चलते भारत में कॉपर (तांबे) की खपत में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। डेटा के अनुसार, यह मांग FY25 में 1.88 मिलियन टन है, जो 2030 तक 3 से 3.26 मिलियन टन और 2047 तक 10 मिलियन टन के आंकड़े को छू सकती है।
आयात पर भारी निर्भरता
भारत के लिए चुनौती यह है कि हम अपनी जरूरत का 95% कॉपर कॉन्सेंट्रेट आयात करते हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश और झारखंड में 12.2 मिलियन टन के संसाधन होने के बावजूद, नई खदान शुरू करने में लगभग 18 साल का लंबा वक्त लगता है। ऐसे में आज लिए गए फैसले का असर एक दशक बाद ही देखने को मिलेगा।
रिफाइनिंग और रिसाइकिलिंग की अहमियत
रिफाइनिंग क्षमता में कमी एक बड़ा बॉटलनेक है। स्टरलाइट कॉपर (Tuticorin) का मामला इस बात का बड़ा उदाहरण है कि कैसे कानूनी और पर्यावरणीय चुनौतियों के कारण उत्पादन ठप हो जाता है। इसका सीधा असर Hindalco Industries जैसी बड़ी कंपनियों और उनकी 'बिरला कॉपर' फैसिलिटी पर पड़ता है।
अब इंडस्ट्री का फोकस माइनिंग से हटकर 'सर्कुलर इकोनॉमी' और रिसाइकिलिंग पर आ गया है। कॉपर को बिना गुणवत्ता खोए बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है, इसलिए सरकार स्क्रैप कलेक्शन को स्टैंडर्डाइज करने की दिशा में काम कर रही है। भविष्य में वही कंपनियां मुनाफे में रहेंगी जो ग्लोबल सप्लाई एग्रीमेंट्स और रिसाइकिलिंग स्ट्रेटजी के बीच सही संतुलन बनाए रखेंगी।
