भारत और चिली के बीच एक अहम ट्रेड डील (CEPA) पर बातचीत चल रही है, जिसे **2026** के अंत तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इस करार का मुख्य मकसद भारत के बढ़ते EV और डेटा सेंटर सेक्टर के लिए कॉपर की निर्बाध सप्लाई सुनिश्चित करना है।
भारत और चिली एक बड़े 'कंप्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट' (CEPA) को अंतिम रूप देने की तैयारी में हैं। यह ट्रेड डील दोनों देशों के बीच मौजूदा सीमित व्यापारिक समझौते की जगह लेगी। भारत के लिए इसका सबसे बड़ा फायदा कॉपर (तांबा) की सुरक्षित सप्लाई हासिल करना है, जो इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) प्रोडक्शन, पावर ग्रिड और डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए एक अनिवार्य रॉ मटेरियल है।
व्यापार में तेजी का दम
चिली दुनिया का सबसे बड़ा कॉपर उत्पादक देश है। इस साझेदारी के जरिए भारत अपनी इंडस्ट्रियल सप्लाई चेन को और भी मजबूत बनाना चाहता है। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार अब $5.6 बिलियन के आंकड़े को पार कर चुका है, जो 5 साल पहले महज $2.4 बिलियन था। इस डील का एक अहम पहलू भारतीय कंपनियों को चिली के माइनिंग सेक्टर में निवेश के लिए प्रोत्साहित करना है, ताकि ग्लोबल मार्केट की उठापटक का असर कम हो सके।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
इन्वेस्टर्स के लिए यह एक नजर रखने वाली बड़ी खबर है, क्योंकि रॉ मटेरियल की लागत सीधे भारतीय मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन को प्रभावित करती है। अगर इस समझौते के तहत इम्पोर्ट ड्यूटी कम होती है, तो कॉपर पर निर्भर रहने वाली कंपनियों की लागत में भारी कमी आ सकती है। हालांकि, कॉम्प्लेक्स टैरिफ बातचीत और जियो-पॉलिटिकल बदलावों के कारण इसमें देरी की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
साथ ही, भारत के लिए अपनी घरेलू रिफाइनिंग क्षमता को बढ़ाना अभी भी एक चुनौती बना हुआ है। रेगुलेटरी और एनवायर्नमेंटल बाधाओं के चलते, रॉ कॉपर मिलने के बावजूद प्रोसेसिंग एक बड़ा फैक्टर रहेगा। मार्केट अब उन डिटेल्स का इंतजार कर रहा है जो मिनरल कोऑपरेशन और ड्यूटी में कटौती से जुड़ी होंगी।
