7 साल बाद ईरान से तेल आयात फिर शुरू
भारत के लिए यह एक बड़ा कदम है, क्योंकि देश 7 साल के लंबे अंतराल के बाद ईरान से कच्चे तेल का आयात फिर से शुरू कर रहा है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ रहा है और वैश्विक सप्लाई चेन (supply chain) बाधित हो रही है। भारत के पेट्रोलियम मंत्रालय ने पुष्टि की है कि रिफाइनरों ने ईरान से तेल की अपनी जरूरतें पूरी कर ली हैं, जिसमें पेमेंट (payment) को लेकर कोई समस्या नहीं है। यह मई 2019 के बाद ईरान से तेल की पहली खरीद है। भारत, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है, पहले अमेरिकी दबाव के चलते ईरान से आयात काफी कम कर चुका था।
अमेरिकी छूट और बाज़ार पर असर
ईरान से तेल आयात फिर से शुरू होने का मुख्य कारण अमेरिका की तरफ से हाल ही में मिली 30-दिन की अस्थायी छूट है, जो 19 अप्रैल तक प्रभावी रहेगी। इस छूट का मकसद वैश्विक तेल की कीमतों को कम करना है, जो मध्य पूर्व में चल रहे संघर्षों के कारण बढ़ गई हैं। यह छूट बाज़ार में लगभग 140 मिलियन बैरल ईरानी तेल लाने की अनुमति देती है, लेकिन यह केवल ट्रांजिट (transit) में मौजूद तेल के लिए है, नए उत्पादन के लिए नहीं। इस बीच, भू-राजनीतिक घटनाओं ने बाज़ार में काफी अस्थिरता पैदा की है। Late February 2026 से Brent crude (ब्रेंट क्रूड) की कीमतों में लगभग 39% का उछाल आया है, जिसका कारण संघर्ष और सप्लाई चेन (supply chain) ब्लॉक होने का डर है। हालांकि, अमेरिकी छूट के बावजूद भारत की यह सक्रिय खरीद रणनीति ऊर्जा जरूरतों और भू-राजनीतिक नियमों के बीच एक सावधानी भरा संतुलन दर्शाती है। वित्तीय और बैंकिंग प्रतिबंध अभी भी एक बड़ी बाधा बने हुए हैं।
भारत की ऊर्जा रणनीति और ईरान की भूमिका
भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का मुख्य जोर 40 से अधिक आपूर्तिकर्ताओं (suppliers) से विविधता बनाए रखना है, ताकि किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता से बचा जा सके। भारत ने रूस और अमेरिका जैसे स्रोतों से आयात बढ़ाया है, साथ ही मध्य पूर्व के पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं के साथ भी रिश्ते मजबूत किए हैं। ऐतिहासिक रूप से, ईरान भारत का दूसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता रहा है। 2018 में अमेरिका द्वारा JCPOA (जेसीपीओए) से हटने के बाद लगाए गए प्रतिबंधों ने इन आयातों को काफी कम कर दिया था, जिसके बाद मई 2019 तक भारत ने ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया था। हाल के वर्षों में, चीन ईरानी तेल का मुख्य खरीदार बनकर उभरा है, जो इसके कुल निर्यात का लगभग 90-91% खरीद रहा है। यह स्थिति वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ते भू-राजनीतिक जोखिमों और सप्लाई चेन (supply chain) की कमजोरियों के कारण ऊर्जा-आयात करने वाले देशों की बदलती रणनीतियों को दर्शाती है। मध्य पूर्व का संघर्ष वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर भारी पड़ा है। 2025 में Strait of Hormuz (स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़) से लगभग 20 मिलियन बैरल प्रति दिन कच्चे तेल और उत्पादों का प्रवाह होता है, जो अब गंभीर व्यवधान का सामना कर रहा है।
'शैडो फ्लीट' और प्रतिबंधों से जोखिम
"प्रतिबंधित जहाजों" पर सवार ईरानी लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) की खेप का भारत आना चिंताएं बढ़ाता है। ये जहाज अक्सर 'शैडो फ्लीट' (shadow fleet) का हिस्सा होते हैं, जिनमें पुराने, खराब रखरखाव वाले जहाज, अस्पष्ट स्वामित्व और बीमा की कमी होती है, जिनका उपयोग प्रतिबंधों को दरकिनार करने के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए, एक अमेरिकी-प्रतिबंधित टैंकर जो ईरानी कच्चे तेल ले जा रहा था, हाल ही में भारत से चीन की ओर मुड़ गया। यह ईरान के SWIFT (स्विफ्ट) ग्लोबल बैंकिंग सिस्टम से बाहर होने के कारण भुगतान की जटिलताओं और मुश्किल शर्तों को उजागर करता है। इन ऑपरेशनों से जुड़े जोखिमों में संभावित पर्यावरणीय नुकसान, सुरक्षा संबंधी चिंताएं और व्यापार वित्त या लॉजिस्टिक्स (logistics) में शामिल लोगों के लिए आकस्मिक प्रतिबंध उल्लंघन शामिल हैं। इसके अलावा, प्रतिबंधों की वापसी या क्षेत्र में बढ़ते संघर्ष से ये आयात मार्ग तुरंत बंद हो सकते हैं, जिससे भारत अपनी उच्च आयात निर्भरता को देखते हुए कमजोर हो सकता है।
भविष्य का नज़रिया: ऊर्जा सुरक्षा को नेविगेट करना
भारत का ऊर्जा सुरक्षा परिदृश्य वैश्विक भू-राजनीतिक स्थिरता और अपनी आयात रणनीति को विविध बनाए रखने की क्षमता से गहराई से जुड़ा हुआ है। अमेरिका से मिली अस्थायी छूट वर्तमान ईरानी तेल और एलपीजी (LPG) आयात के लिए तत्काल राहत प्रदान करती है। हालांकि, इन अपरंपरागत स्रोतों की दीर्घकालिक सफलता बदलते अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और प्रतिबंधों पर निर्भर करती है। मध्य पूर्व के तनावों से प्रेरित तेल की कीमतों और सप्लाई चेन (supply chain) में चल रही अस्थिरता के लिए भारत के ऊर्जा क्षेत्र को लगातार अनुकूलन (adapt) और लचीलापन (resilience) बनाने की आवश्यकता है।