भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने पिछले एक दशक में अपने विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Reserves) को मजबूत करने के लिए गोल्ड और अमेरिकी सरकारी बॉन्ड्स में भारी निवेश किया है। यह रणनीति भारत को अन्य बड़ी वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं से अलग खड़ा करती है।
भारत ने अपने फॉरेन रिजर्व एसेट्स को बढ़ाने के लिए एक सोची-समझी रणनीति अपनाई है। जून 2016 से जून 2026 के आंकड़ों पर नजर डालें तो देश की US Treasury होल्डिंग्स 59% बढ़कर $117.2 अरब से $186.4 अरब पर पहुंच गई हैं। इसी दौरान, सोने का भंडार भी 58% की उछाल के साथ 557.77 टन से बढ़कर 880.51 टन हो गया है।
वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं से अलग है भारत की राह
यह अप्रोच बाकी देशों से काफी अलग है। उदाहरण के लिए, चीन ने पिछले एक दशक में अपने US बॉन्ड होल्डिंग्स को लगभग आधा कर दिया है और गोल्ड पर फोकस बढ़ाया है। वहीं, ब्रिटेन ने गोल्ड रिजर्व को स्थिर रखते हुए US ट्रेजरी में निवेश बढ़ाया है। साफ है कि दुनिया भर के सेंट्रल बैंक अपनी आर्थिक जरूरतों के हिसाब से अलग-अलग रास्ते चुन रहे हैं।
निवेशकों के लिए क्यों है जरूरी?
विदेशी मुद्रा भंडार भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक मजबूत 'बफर' (Buffer) का काम करता है। यह भंडार रुपये की वैल्यू को मैनेज करने और बाहरी आर्थिक झटकों से निपटने में RBI की मदद करता है। बॉन्ड्स जहां लिक्विडिटी (Liquidity) प्रदान करते हैं, वहीं सोना महंगाई और करेंसी उतार-चढ़ाव से सुरक्षा का पारंपरिक जरिया बना हुआ है।
हालांकि, हाल के दिनों में कुछ बदलाव भी दिखे हैं। जून 2026 तक के एक साल में US बॉन्ड होल्डिंग्स $227.4 अरब से घटकर $186.4 अरब रही हैं। यह दर्शाता है कि रिजर्व मैनेजमेंट एक सतत प्रक्रिया है, जो ग्लोबल इंटरेस्ट रेट्स और मार्केट की परिस्थितियों पर आधारित है। निवेशकों के लिए अब यह देखना अहम होगा कि आने वाले महीनों में रिजर्व का कंपोजिशन कैसे बदलता है।
