Ministry of Mines ने 2019 की National Mineral Policy की समीक्षा के लिए एक **9-सदस्यीय** कमेटी का गठन किया है। इस नए बदलाव का उद्देश्य क्रिटिकल मिनरल्स, डीप-सी माइनिंग और रिसाइकिलिंग पर जोर देकर आयात (Import) पर निर्भरता को कम करना है।
भारत सरकार ने देश की माइनिंग स्ट्रैटेजी को नया रूप देने के लिए कमर कस ली है। Ministry of Mines ने एक उच्च-स्तरीय कमेटी बनाई है, जिसे अगले 2 महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपनी है। यह कदम पारंपरिक खनन से हटकर आधुनिक जरूरतों, जैसे इलेक्ट्रिक व्हीकल और रिन्यूएबल एनर्जी के लिए जरूरी क्रिटिकल मिनरल्स पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश है।
निवेशकों के लिए क्यों है यह जरूरी?
फिलहाल भारत लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे खनिजों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। अगर नई पॉलिसी से प्राइवेट कंपनियों को एक्सप्लोरेशन में आने का प्रोत्साहन मिलता है, तो आने वाले समय में घरेलू उत्पादन बढ़ सकता है। सरकार इस बार डीप-सी माइनिंग और सर्कुलर इकोनॉमी (रिसाइकिलिंग) जैसी आधुनिक तकनीकों को भी इसमें शामिल करने की तैयारी में है।
क्या हैं चुनौतियां?
माइनिंग सेक्टर हमेशा से ही एनवायर्नमेंटल क्लीयरेंस और भूमि अधिग्रहण (Land Acquisition) जैसी पेचीदा प्रक्रियाओं के बीच रहा है। हालांकि 2019 की पॉलिसी में पारदर्शिता और ऑक्शनिंग को बेहतर बनाने की कोशिश हुई थी, लेकिन जमीन पर प्रोजेक्ट्स का क्रियान्वयन (Execution) अभी भी एक चुनौती है। निवेशकों को यह देखना होगा कि क्या सरकार पर्यावरण नियमों से समझौता किए बिना प्राइवेट प्लेयर्स के लिए एंट्री बैरियर को कम कर पाती है या नहीं।
अगला कदम क्या होगा?
बाजार की नजरें अब 60 दिन बाद आने वाली कमेटी की सिफारिशों पर टिकी हैं। यह रिपोर्ट ही अगले दशक के लिए माइनिंग रेगुलेशन का रोडमैप तय करेगी। हालांकि, पॉलिसी में बदलाव और उसके जमीन पर दिखने के बीच का सफर लंबा हो सकता है, इसलिए निवेशकों को जल्दबाजी के बजाय ठोस सुझावों का इंतजार करना चाहिए।
