भारत सरकार ने घरेलू कीमतों को काबू में रखने के लिए 10 लाख टन कच्ची चीनी के आयात को ड्यूटी-फ्री करने की इजाजत दे दी है। इस फैसले से भारतीय चीनी स्टॉक्स में शुक्रवार को **3%** से **7%** तक की गिरावट देखी गई।
शुगर सेक्टर पर सरकारी कैंची
बढ़ती घरेलू कीमतों पर लगाम लगाने के लिए भारत सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के आयात को ड्यूटी-फ्री कर दिया है। यह फैसला 31 अक्टूबर 2026 तक मान्य टैरिफ रेट कोटा (TRQ) के तहत लिया गया है, और यह एक दशक में पहली बार है जब इस तरह का इंपोर्ट अलाउंस दिया गया है। सरकार का मकसद त्योहारी सीजन से पहले घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाना और कीमतों की अस्थिरता को कम करना है। हाल ही में, चीनी की कीमतें ₹4,000 से ₹5,500 प्रति क्विंटल तक पहुंच गई थीं।
पाकिस्तान की एंट्री?
इस ऐलान के बाद, पाकिस्तान का चीनी उद्योग भी भारत की ओर देख रहा है। पाकिस्तान शुगर मिल्स एसोसिएशन (PSMA) के अनुसार, वहां के उत्पादकों के पास करीब 12 लाख टन अतिरिक्त चीनी का स्टॉक है। इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का कहना है कि भारत को निर्यात करने से उन्हें वित्तीय राहत मिल सकती है और आने वाले क्रशिंग सीजन से पहले नकदी की कमी को पूरा करने में मदद मिलेगी।
ट्रेड बैरियर्स का पेंच
हालांकि, दोनों देशों के बीच मौजूदा राजनीतिक तनाव के कारण व्यापार सीधा नहीं हो पाएगा। भारत और पाकिस्तान के बीच सालों से व्यापारिक संबंध निलंबित हैं। भारत की इंपोर्ट पॉलिसी भले ही राह खोलती हो, लेकिन पाकिस्तानी चीनी के भारत आने के लिए बड़े राजनयिक समझौते और सरकार-से-सरकार स्तर की मंजूरी की जरूरत होगी, जिस पर अभी अनिश्चितता बनी हुई है।
निवेशकों की घबराहट
इस खबर के आते ही शुक्रवार को भारतीय चीनी कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट आई। Balrampur Chini Mills, Dalmia Bharat Sugar, और Dwarikesh Sugar जैसे प्रमुख शेयरों में 3% से 7% तक की गिरावट दर्ज की गई। निवेशकों को डर है कि आयातित चीनी की बढ़ी हुई सप्लाई से घरेलू एक्स-मिल कीमतों पर दबाव आ सकता है, जिससे उत्पादकों के मुनाफे पर असर पड़ेगा।
आगे क्या?
अब निवेशकों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार किन देशों से इंपोर्ट की इजाजत देती है, इस नए कोटे के तहत बाजार में कितनी चीनी आती है, और पाकिस्तान के साथ व्यापार नीति पर क्या अपडेट आता है। यह भी देखना अहम होगा कि क्या इस पॉलिसी से घरेलू चीनी की कीमतें स्थिर होती हैं या आने वाली तिमाहियों में कंपनियों को मार्जिन प्रेशर झेलना पड़ता है।
