भू-राजनीतिक तनावों के चलते वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ रहे असर को देखते हुए, भारत सरकार ने एनर्जी, खाद्य पदार्थ और फर्टिलाइजर जैसे ज़रूरी क्षेत्रों को झटकों से बचाने के लिए अपनी सुरक्षा पहरे को और मज़बूत कर दिया है। हाल ही में हुई कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की एक हाई-लेवल मीटिंग में इस रणनीति को अंतिम रूप दिया गया, जिसका मुख्य मक़सद ज़रूरी सामानों की निर्बाध उपलब्धता बनाए रखना और कीमतों को स्थिर रखना है।
अहम उपायों पर सरकार का ज़ोर
इस अहम बैठक में कई रणनीतिक उपायों पर चर्चा हुई। एनर्जी इंपोर्ट (Energy Import) के लिए नए रास्तों की तलाश पर ज़ोर दिया गया, खासकर लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) जैसे ज़रूरी ईंधनों के लिए। नतीजतन, भारत का एनर्जी इंपोर्ट नेटवर्क अब 41 देशों तक फ़ैल गया है, जो कुछ समय पहले तक सिर्फ़ 27 देशों तक सीमित था। इससे किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम होगी। क्रूड ऑयल की बात करें तो, अब लगभग 70% इंपोर्ट मध्य पूर्व के हॉरमूज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होकर गुजरने के बजाय दूसरे रास्तों से आ रहा है, जबकि तनाव बढ़ने से पहले यह आंकड़ा करीब 55% था।
डोमेस्टिक लेवल पर भी सरकार सतर्क है। एलपीजी की जमाखोरी (hoarding) और अवैध बिक्री के खिलाफ सख़्त नियम लागू किए जा रहे हैं ताकि कीमतें नियंत्रण में रहें। इसके साथ ही, गर्मियों की पीक डिमांड को पूरा करने के लिए बिजली उत्पादन (power generation) क्षमता को भी बढ़ाने के प्रयास तेज़ कर दिए गए हैं।
ग्लोबल रिस्क और भारत की स्थिति
यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मध्य पूर्व में मचे भू-राजनीतिक हलचल का असर ग्लोबल कमोडिटी मार्केट्स पर सीधे तौर पर दिख रहा है। दुनिया के नाइट्रोजन फर्टिलाइजर एक्सपोर्ट का लगभग 25-30% और ग्लोबल एलएनजी (LNG) ट्रेड का करीब 20% हॉरमूज जलडमरूमध्य से होकर गुज़रता है। हालिया तनावों के कारण इस महत्वपूर्ण रास्ते से जहाजों का गुज़रना काफी कम हो गया है, जिससे ग्लोबल यूरिया की कीमतों में करीब 26% का उछाल आ चुका है और कतर व यूएई से होने वाले बड़े एक्सपोर्ट फंसने का खतरा मंडरा रहा है। क्रूड ऑयल के दाम भी तेज़ी से बढ़े हैं।
भारत, जो अपने क्रूड ऑयल और गैस का लगभग 90% इंपोर्ट करता है, इन मार्केट शिफ्ट्स के प्रति काफ़ी सेंसिटिव है। फर्टिलाइजर सेक्टर अकेले भारत की कुल नेचुरल गैस का करीब 30% इस्तेमाल करता है, जो इसे एनर्जी प्राइस वोलैटिलिटी के प्रति बेहद संवेदनशील बनाता है। भारत अपने फर्टिलाइजर्स का एक बड़ा हिस्सा इंपोर्ट करता है, जिसमें करीब 20% यूरिया, 50-60% डी-अमोनियम फॉस्फेट (DAP) और लगभग सारा म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) शामिल है। सरकार विदेशी सप्लायर्स से DAP और NPKS के इंपोर्ट को कोऑर्डिनेट करने के साथ-साथ डोमेस्टिक यूरिया प्रोडक्शन को भी बनाए रखने पर काम कर रही है।
एनर्जी और फर्टिलाइजर के अलावा, सरकार एसेंशियल कमोडिटीज एक्ट के तहत राज्यों के साथ मिलकर रिटेल फूड प्राइसेज (retail food prices) पर भी बारीकी से नज़र रख रही है। हॉरमूज के पास संभावित सप्लाई व्यवधानों के चलते एविएशन, शिपिंग, लॉजिस्टिक्स और छोटे व्यवसायों जैसे क्षेत्रों के लिए भी जोखिमों का आकलन किया जा रहा है।
बाकी चुनौतियां और कमजोरियां
सरकारी उपायों के बावजूद, भारत की एलएनजी (LNG) और डीएपी (DAP) जैसे इंपोर्टेड कमोडिटीज पर भारी निर्भरता एक स्ट्रक्चरल वल्नरेबिलिटी (structural vulnerability) बनी हुई है। उदाहरण के लिए, यूरिया प्रोडक्शन के लिए इंपोर्टेड नेचुरल गैस पर निर्भरता, इस सेक्टर को एनर्जी मार्केट के उतार-चढ़ाव के प्रति खुला छोड़ देती है। कोई भी लंबा भू-राजनीतिक तनाव कीमतों में और बढ़ोत्तरी कर सकता है, जो कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है, खासकर जब भारत फर्टिलाइजर का एक बड़ा उपभोक्ता है। पावर जनरेशन के लिए डोमेस्टिक कोल स्टॉक पर्याप्त होने के बावजूद, अन्य क्षेत्रों के लिए इंपोर्टेड फ्यूल पर निर्भरता व्यापक जोखिम पैदा करती है। हॉरमूज जलडमरूमध्य, इंपोर्ट रूट को डायवर्सिफाई (diversify) करने के भारत के प्रयासों के बावजूद, सप्लाई लाइन्स के लिए एक लगातार चुनौती बना हुआ है। स्टॉकपाइल्स (stockpiles) और नई इंपोर्ट स्ट्रेटेजीज़ (import strategies) की प्रभावशीलता संघर्ष की अवधि से परखी जाएगी, जिसमें छुपी हुई कीमतों में बढ़ोत्तरी या सप्लाई में रुकावटों का विभिन्न उद्योगों पर असर पड़ने की संभावना है।
आगे की राह: दीर्घकालिक मजबूती का निर्माण
ऊर्जा और फर्टिलाइजर के सोर्स को डायवर्सिफाई (diversify) करने, डोमेस्टिक प्रोडक्शन को बढ़ाने और इन्वेंटरीज (inventories) को प्रभावी ढंग से मैनेज करने की भारत की रणनीति, वर्तमान वैश्विक अनिश्चितताओं से निपटने में मदद करेगी। सरकार का सक्रिय दृष्टिकोण और निरंतर निगरानी आर्थिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि, लॉन्ग-टर्म रेज़िलिएंस (long-term resilience) आयात पर निर्भरता कम करने, घरेलू क्षमताओं को मज़बूत करने और अस्थिर ग्लोबल कमोडिटी मार्केट्स की जटिलताओं के अनुकूल ढलने के निरंतर प्रयासों पर निर्भर करेगी।