भारतीय पेपर निर्माताओं का संगठन (IPMA) इंडोनेशिया से आयातित पेपरबोर्ड पर तुरंत एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाने की मांग कर रहा है। इसकी वजह से घरेलू उत्पादकों को फाइनेंशियल ईयर 2024-25 में **₹242 करोड़** का भारी नुकसान हुआ है। सुरक्षा उपाय 30 सितंबर, 2026 को समाप्त हो रहे हैं, और कंपनियां सरकारी कार्रवाई का इंतजार कर रही हैं।
घरेलू उद्योग पर आयात का दबाव
भारतीय पेपर निर्माताओं के संगठन (IPMA) ने सरकार से गुहार लगाई है कि इंडोनेशिया से आने वाले वर्जिन मल्टी-लेयर पेपरबोर्ड पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाई जाए। उद्योग का कहना है कि सस्ते विदेशी माल के कारण उन्हें कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है।
DGTR की जांच और सिफारिशें
व्यापार उपचार महानिदेशालय (DGTR) ने इस मामले की जांच पूरी कर ली है और ड्यूटी लगाने की सिफारिश की है। अलग-अलग उत्पादकों के लिए यह ड्यूटी USD 261 से USD 376 प्रति मीट्रिक टन तक हो सकती है। कंपनियां चाहती हैं कि इस पर जल्द फैसला हो, क्योंकि इंपोर्ट पर मिनिमम इंपोर्ट प्राइस (MIP) यानी ₹67,220 प्रति मीट्रिक टन का मौजूदा सुरक्षा उपाय 30 सितंबर, 2026 को खत्म होने वाला है।
महंगे आयात से ₹242 करोड़ का नुकसान
आंकड़े बताते हैं कि सस्ते इंपोर्ट ने घरेलू निर्माताओं की कमर तोड़ दी है। IPMA के अनुसार, 2024-25 फाइनेंशियल ईयर में इस सस्ते इंपोर्ट के चलते घरेलू वर्जिन पेपरबोर्ड उद्योग को करीब ₹242 करोड़ का अनुमानित नुकसान हुआ। DGTR की जांच में पाया गया कि इन इंपोर्ट्स की मात्रा 2021-22 में सिर्फ 296 टन थी, जो 2024-25 में बढ़कर 62,935 टन हो गई। इसी दौरान, इन इंपोर्ट्स की कीमत 25% तक गिर गई।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
इस प्राइसिंग प्रेशर के कारण भारतीय कंपनियों को अपने दाम कम करने पड़े, जिससे उनके प्रॉफिट मार्जिन पर असर पड़ा। ITC, JK Paper और Century Pulp & Paper जैसी कंपनियां अक्सर तब मुश्किल में पड़ जाती हैं जब इंपोर्ट की कीमतें उनके प्रोडक्शन कॉस्ट से भी नीचे चली जाती हैं। एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगने से इंपोर्टेड माल महंगा हो जाएगा, जिससे घरेलू उत्पादकों को अपना दाम बनाए रखने या बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
डाउनस्ट्रीम यूजर्स पर भी होगा असर
हालांकि, पैकेजिंग और कंज्यूमर गुड्स बनाने वाली कंपनियों के लिए यह एक जोखिम भी है। अगर ड्यूटी लगती है, तो इंपोर्टेड पेपरबोर्ड महंगा होने के कारण उनके कच्चे माल की लागत बढ़ सकती है। निवेशकों को सरकारी नोटिफिकेशन का इंतजार करना होगा, क्योंकि यह फैसला पेपर निर्माताओं और उनके ग्राहकों के भविष्य के बाजार को तय करेगा।
