देश की दो बड़ी तेल कंपनियां, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOCL) और मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स (MRPL), ने सप्लाई को सुरक्षित करने के लिए एक बड़ी पहल की है। दोनों ने मिलकर पश्चिम एशिया और अफ्रीका से **50 लाख (5 मिलियन) बैरल** कच्चे तेल का सौदा किया है। यह कदम लाल सागर और होरमुज जलडमरूमध्य में समुद्री सुरक्षा चिंताओं के बीच उठाया गया है, ताकि सप्लाई चेन बाधित न हो।
सप्लाई चेन को मजबूत करने की तैयारी
समुद्री मार्गों पर बढ़ते खतरों को देखते हुए भारतीय रिफाइनरी कंपनियां सक्रिय हो गई हैं। इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOCL) और मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स (MRPL) ने हाल के दिनों में कुल 50 लाख (5 मिलियन) बैरल कच्चे तेल की खरीद की है। यह तेल पश्चिम एशिया और अफ्रीका से मंगाया गया है, ताकि उनकी रिफाइनरियां बिना किसी रुकावट के चलती रहें।
IOCL ने इसमें से 40 लाख (4 मिलियन) बैरल का सौदा वेस्ट अफ्रीकन क्रूड ग्रेड्स जैसे नेम्बा, सैक्सी, बाटूके और डीनो के लिए शेवरॉन (Chevron) के साथ किया है। वहीं, MRPL ने मित्सुई एंड कंपनी (Mitsui & Co) से 10 लाख (1 मिलियन) बैरल ओमान क्रूड खरीदा है।
लॉजिस्टिक्स और बढ़े खर्चे
यह खरीद सिर्फ रूटीन का मामला नहीं है, बल्कि सप्लाई चेन में आने वाली बाधाओं के खिलाफ एक डिफेंसिव रणनीति का हिस्सा है। लाल सागर और होरमुज जलडमरूमध्य जैसे प्रमुख ऊर्जा गलियारों में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण ये पारंपरिक शिपिंग रूट अब खतरनाक और महंगे हो गए हैं। इसी के चलते, MRPL ने अपने स्पॉट इंपोर्ट टेंडर्स में ऐसे क्लॉज शामिल किए हैं, जिनसे इन संकरे जलमार्गों से बचा जा सके।
इस नई रणनीति का एक सीधा असर कंपनी के खर्चों पर पड़ेगा। सीधे रास्ते से बचने के लिए टैंकरों को अब केप ऑफ गुड होप जैसे लंबे रास्तों से होकर गुजरना पड़ रहा है, जिससे माल ढुलाई का खर्चा बढ़ गया है। इसके अलावा, लंबी अवधि के कॉन्ट्रैक्ट्स के बजाय स्पॉट मार्केट से तेल खरीदना अक्सर महंगा पड़ता है। उदाहरण के लिए, MRPL के हालिया सौदे में $3 प्रति बैरल का प्रीमियम भी शामिल था, जो डेटेड ब्रेंट कॉन्ट्रैक्ट प्राइस से ऊपर है।
रिफाइनिंग मार्जिन पर असर
निवेशकों के लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि इन घटनाओं का सीधा असर तेल रिफाइनिंग के मुनाफे पर पड़ता है। जब रिफाइनरियां कच्चे तेल के लिए ज्यादा प्रीमियम और शिपिंग पर अधिक खर्च करती हैं, तो उनके ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन (GRMs) पर दबाव आ सकता है। अगर कच्चे तेल को सोर्स करने, शिप करने और प्रोसेस करने की लागत बढ़ती है, तो प्रति बैरल नेट प्रॉफिट कम हो सकता है। यह तब तक हो सकता है जब तक कि कंपनियां इन बढ़े हुए खर्चों को प्रोडक्ट की कीमतों के जरिए ग्राहकों पर न डाल दें, जो कि घरेलू बाजार की मांग पर निर्भर करता है।
बाजार पर नजर रखने वालों के लिए यह देखना अहम होगा कि ये लॉजिस्टिक्स की दिक्कतें कब तक बनी रहती हैं। अगर समुद्री रास्ते असुरक्षित रहते हैं, तो लंबी सप्लाई चेन के कारण बढ़ी हुई लागत भारतीय तेल कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन पर दबाव डाल सकती है। शेयरधारकों को यह भी देखना होगा कि कंपनियां इन अतिरिक्त खर्चों को कैसे मैनेज कर रही हैं और क्या वे शॉर्ट-टर्म मार्जिन के बजाय सप्लाई चेन की स्थिरता पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं।
