तेल बाज़ार में आया यू-टर्न: IEA का बड़ा अनुमान
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने वैश्विक तेल बाज़ार के अपने अनुमानों में भारी बदलाव किया है। अब एजेंसी 2026 में 17.8 लाख बैरल प्रति दिन (1.78 million barrels per day) की बड़ी कमी का अनुमान लगा रही है। यह पिछले अनुमान से बिल्कुल उलट है, जिसमें 4.1 लाख बैरल प्रति दिन (0.41 million barrels per day) के अधिशेष (surplus) की उम्मीद थी। यह बदलाव बाज़ार में उम्मीद से कहीं ज़्यादा कसाव का संकेत देता है। एजेंसी का मानना है कि अगर होर्मुज जलडमरूमध्य से सप्लाई जून तक धीरे-धीरे फिर से शुरू हो जाती है, तो भी 2026 में कुल वैश्विक तेल सप्लाई 39 लाख बैरल प्रति दिन (3.9 million barrels per day) तक गिर सकती है। यह पिछले अनुमान 15 लाख बैरल प्रति दिन (1.5 million barrels per day) की गिरावट से कहीं ज़्यादा चिंताजनक है। इस सप्लाई की स्थिति से कच्चे तेल की कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव बढ़ने की आशंका है, जिसके चलते ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) अभी $107 प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है।
होर्मुज संकट: सप्लाई में कमी और बढ़ा जोखिम
यह संकट होर्मुज जलडमरूमध्य के कारण और गंभीर हो गया है, जो वैश्विक तेल परिवहन का लगभग 20% हिस्सा संभालता है। फरवरी में संघर्ष शुरू होने के बाद से, इस जलडमरूमध्य में आई रुकावटों के कारण कुल मिलाकर 1.28 करोड़ बैरल (12.8 million barrels) की वैश्विक सप्लाई का नुकसान हुआ है। ईरान ने यह भी संकेत दिया है कि वह जहाजों पर टोल लगा सकता है, जिससे लम्बे समय तक आर्थिक दबाव बना रह सकता है और बाज़ार में जोखिम प्रीमियम (risk premium) बढ़ सकता है। अतीत में भी महत्वपूर्ण नाकों पर ऐसी रुकावटें, जैसे 1980 के दशक का "टैंकर युद्ध" (Tanker War) और 2019 में अरामको (Aramco) पर हमले, कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव और बाज़ार में घबराहट का कारण बनी हैं।
भू-राजनीति, डिमांड और सप्लाई: बाज़ार की नई तस्वीर
तेल बाज़ार में आजकल सप्लाई और डिमांड के बुनियादी सिद्धांतों से ज़्यादा भू-राजनीतिक जोखिम प्रीमियम (geopolitical risk premium) हावी हो रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि अप्रैल में ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) का $128 प्रति बैरल से ऊपर जाना मुख्य रूप से मध्य पूर्व संघर्ष (Middle East conflict) के डर के कारण था। हालांकि IEA का अनुमान है कि 2026 में ऊँची कीमतों और आर्थिक दबावों के कारण वैश्विक तेल डिमांड 4.2 लाख बैरल प्रति दिन (420,000 barrels per day) तक गिर सकती है, लेकिन यह डिमांड का कम होना सप्लाई की कमी की पूरी भरपाई शायद न कर पाए। विश्लेषक ओपेक+ (OPEC+) द्वारा घोषित 2.06 लाख बैरल प्रति दिन (206,000 barrels per day) की मामूली उत्पादन बढ़ोतरी की प्रभावशीलता पर सवाल उठा रहे हैं, इसे "प्रतीकात्मक" और नुकसान के पैमाने के हिसाब से अपर्याप्त बता रहे हैं। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का हाल ही में ओपेक (OPEC) से अलग होना भी वैश्विक सप्लाई की तस्वीर को बदल रहा है। वैश्विक इन्वेंटरी (global inventories) रिकॉर्ड गति से कम हो रही हैं, अकेले मार्च और अप्रैल में ही लगभग 25 करोड़ बैरल (250 million barrels) की कमी आई है, जिससे सप्लाई और कस गई है।
आर्थिक चुनौतियाँ: महंगाई और वैश्विक स्थिरता पर असर
ऊर्जा की कीमतों में लगातार झटके लगने के गंभीर और दूरगामी परिणाम होते हैं। अप्रैल में अमेरिका में कुल महंगाई (inflation) में 40% की बढ़ोतरी के पीछे ऊँची ऊर्जा लागतें थीं। अनुमान है कि अगर तेल की कीमतें ऊँची बनी रहीं तो महंगाई दर 4% से ऊपर जा सकती है, जिससे केंद्रीय बैंकों की नीतियां और जटिल हो जाएंगी और मंदी व महंगाई के एक साथ असर (stagflationary pressures) का खतरा बढ़ जाएगा। आयात करने वाली अर्थव्यवस्थाएं, खासकर एशिया में, ज़्यादा संवेदनशील हैं और अगर ये रुकावटें बनी रहीं तो उनकी जीडीपी (GDP) में गिरावट आ सकती है। हालांकि अमेरिका अब पेट्रोलियम उत्पादों का शुद्ध निर्यातक है, फिर भी वैश्विक अर्थव्यवस्था दशकों पहले की तुलना में लम्बे समय तक चलने वाले ऊर्जा झटकों से निपटने में कम लचीली है। इसका संरचनात्मक प्रभाव (structural impact) वैकल्पिक ऊर्जा की ओर बदलाव को तेज़ कर सकता है और वैश्विक ऊर्जा नीतियों को नया आकार दे सकता है।
कीमतों पर अलग-अलग राय
IEA का अनुमान बताता है कि साल भर वैश्विक तेल इन्वेंटरी (global inventories) कम होती रहेंगी, जो बाज़ार में लम्बे समय तक कसाव का संकेत है। हालांकि, कुछ विश्लेषकों की राय मंदी की ओर झुकी हुई है, और उनका मानना है कि अगर भू-राजनीतिक तनाव कम होते हैं तो कीमतों में सुधार (correction) हो सकता है। तत्काल परिदृश्य (immediate outlook) अभी भी होर्मुज जलडमरूमध्य की अस्थिर स्थिति और ईरान के रणनीतिक कदमों से काफी प्रभावित है।
