ICICI Prudential Silver ETF ने पिछले तीन सालों में करीब **46%** का सालाना रिटर्न देकर निवेशकों को मालामाल कर दिया है। यह शानदार प्रदर्शन ग्लोबल सिल्वर की कीमतों में आए उछाल का नतीजा है। हालांकि, इस कमोडिटी-लिंक्ड ग्रोथ में निवेश से पहले निवेशकों को इसकी हाई वोलैटिलिटी और इंडस्ट्रियल डिमांड जैसे रिस्क को समझना बेहद जरूरी है। फिलहाल, इस फंड के पास **₹13,800 करोड़** से ज्यादा की संपत्ति है।
3 साल में 46% का सालाना रिटर्न!
ICICI Prudential Silver ETF ने हाल के समय में अपने लॉन्ग-टर्म परफॉर्मेंस से सबका ध्यान खींचा है। पिछले तीन सालों में इस फंड ने लगभग 46% का एनुअलाइज्ड (सालाना) रिटर्न दिया है। यह दिखाता है कि जब मार्केट कमोडिटी की कीमतों के लिए फेवरेबल होता है, तो प्रीशियस मेटल्स, खासकर सिल्वर, पोर्टफोलियो में अहम भूमिका निभा सकते हैं। पिछले एक साल में इस फंड ने करीब 99% का रिटर्न दिया है, जो ग्लोबल मार्केट में फिजिकल सिल्वर की कीमतों में आए उछाल को दर्शाता है।
परफॉर्मेंस और रिस्क का कनेक्शन
यह परफॉर्मेंस भले ही शानदार हो, लेकिन निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि यह सीधे तौर पर फिजिकल सिल्वर की कीमत से जुड़ी हुई है। इक्विटी फंड्स के उलट, जहां कंपनी की कमाई और मैनेजमेंट के फैसले परफॉर्मेंस तय करते हैं, सिल्वर ETF पूरी तरह से मेटल की डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करते हैं। जब ग्लोबल सिल्वर की कीमतें बढ़ती हैं, तो इन ETF का नेट एसेट वैल्यू (NAV) भी उसी के अनुसार बढ़ता है, लेकिन मार्केट में गिरावट आने पर इसका उल्टा भी उतना ही सच है।
कॉम्पिटिशन और एक्सपेंस रेशियो
इंडियन मार्केट में, यह फंड Nippon India, Kotak और HDFC Silver ETFs जैसे कई बड़े प्लेयर्स के साथ कॉम्पिटिशन में है। Nippon India के पास इनमें सबसे बड़ी एसेट बेस है, जबकि ICICI Prudential जैसे फंड्स ने कॉम्पिटिटिव एक्सपेंस रेशियो पर फोकस किया है, जो फिलहाल करीब 0.40% है। यह रेशियो वह सालाना फीस है जो निवेशक फंड के मैनेजमेंट के लिए देते हैं। लंबे समय में अच्छा रिटर्न पाने के लिए इस लागत को कम रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह ETF के परफॉर्मेंस और सिल्वर की असल कीमत के बीच के अंतर को कम करता है।
सिल्वर ETF में निवेश के रिस्क
गोल्ड-बेस्ड इन्वेस्टमेंट से अलग, सिल्वर ETF में निवेश करने वालों को इसके खास रिस्क के बारे में पता होना चाहिए। सिल्वर एक इंडस्ट्रियल मेटल है। इसकी डिमांड इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर पैनल और मेडिकल इक्विपमेंट जैसे सेक्टर्स से आती है। इसी वजह से, सिल्वर की कीमतें अक्सर गोल्ड से ज्यादा वोलेटाइल (अस्थिर) होती हैं। अगर ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग में मंदी आती है या इंडस्ट्रियल डिमांड में कोई बदलाव होता है, तो सिल्वर की कीमतों में भारी गिरावट आ सकती है। इससे उन निवेशकों के लिए रिस्क बढ़ जाता है जो वैल्यू में उतार-चढ़ाव के लिए तैयार नहीं हैं।
ट्रैकिंग एरर और आगे क्या देखें?
एक और टेक्निकल फैक्टर जिस पर नजर रखनी चाहिए, वह है ट्रैकिंग एरर। यह ETF के परफॉर्मेंस और फिजिकल सिल्वर की कीमत के मूवमेंट के बीच एक छोटा सा अंतर होता है। फंड हाउस इस अंतर को कम से कम रखने की कोशिश करते हैं, लेकिन ऑपरेशनल कॉस्ट और मार्केट लिक्विडिटी की वजह से कभी-कभी ETF की कीमत बेंचमार्क से थोड़ा भटक सकती है। इन निवेशों को ट्रैक करने वालों के लिए, ग्लोबल इंडस्ट्रियल मैन्युफैक्चरिंग डेटा, सेंट्रल बैंक के इंटरेस्ट रेट के फैसले और सिल्वर मार्केट में सप्लाई-डिमांड का ओवरऑल बैलेंस मुख्य निगरानी वाले बिंदु बने रहेंगे।
