Hilsa Fisheries Crisis: क्लाइमेट चेंज और नियमों की कमी से हिलसा मछली पर मंडराया बड़ा संकट

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AuthorAditya Rao|Published at:
Hilsa Fisheries Crisis: क्लाइमेट चेंज और नियमों की कमी से हिलसा मछली पर मंडराया बड़ा संकट

जलवायु परिवर्तन के कारण हिलसा मछली का प्रवास बदल रहा है, जिससे सप्लाई चेन पर खतरा पैदा हो गया है। भारत और बांग्लादेश के बीच नियमों में तालमेल न होने के कारण कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव की आशंका है, जो निवेशकों के लिए बड़ी चिंता का विषय है।

बदलता रूट और पर्यावरण का असर

पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के लिए अहम हिलसा फिशरी एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। समुद्र के बढ़ते तापमान और नदियों के रास्तों में बनी रुकावटों के कारण यह मछली अब नदी के बजाय समुद्री इलाकों की ओर रुख कर रही है। हिलसा के प्रजनन के लिए साफ और तेज बहाव वाली नदियों की जरूरत होती है, लेकिन समुद्र का बढ़ता जलस्तर और खारे पानी का नदियों में प्रवेश उनके नेचुरल ब्रीडिंग ग्राउंड्स को खत्म कर रहा है। इसके अलावा, औद्योगिक प्रदूषण ने भी इनके प्राकृतिक आवास को सीमित कर दिया है।

नियमों की पहेली

रेगुलेटरी मोर्चे पर स्थिति और भी उलझी हुई है। बांग्लादेश जहाँ मछली के संरक्षण के लिए सख्त बैन लगाता है, वहीं भारत के नियम अक्सर इससे मेल नहीं खाते। इस गैप का असर यह होता है कि जब एक देश मछली पकड़ने पर रोक लगाता है, तो मछली दूसरे देश के समुद्री सीमा में चली जाती है, जिससे संरक्षण के प्रयास बेकार हो जाते हैं। यह स्थिति स्टॉक की लंबी अवधि की उपलब्धता को कम कर रही है।

बदलता भूगोल और भविष्य की चुनौती

इसका सीधा असर पश्चिम बंगाल में देखने को मिल रहा है, जहाँ मछली का कैच कम हुआ है। दूसरी ओर, गुजरात के नर्मदा नदी सिस्टम में हिलसा का उत्पादन बढ़ना एक अप्रत्याशित बदलाव है। भविष्य में इस सेक्टर की स्थिरता केवल भारत, बांग्लादेश और म्यांमार के बीच डेटा शेयरिंग और साझी नीतियों पर निर्भर करेगी। यदि देशों के बीच तालमेल नहीं बैठा, तो सीफूड मार्केट में सप्लाई की कमी और कीमतों में अस्थिरता तय है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.