भारत सरकार अगले दो हफ्तों में गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम (GMS) में बड़ा बदलाव करने जा रही है। इस नई योजना के तहत अब ज्वैलर्स भी ग्राहकों से सीधे सोना जमा कर सकेंगे, जिससे देश के करीब **25,000 टन** पड़े हुए सोने को बैंकिंग सिस्टम में लाया जा सके।
क्या है नई योजना?
सरकारी सूत्रों के अनुसार, गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम (GMS) का नया और बदला हुआ रूप जल्द ही लॉन्च किया जाएगा। इसका मुख्य मकसद देश में पड़े हुए भारी मात्रा में सोने को मोबिलाइज करना है। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब स्थानीय ज्वैलर्स को 'कलेक्शन पार्टनर्स' बनाया जाएगा। पहले यह सुविधा सिर्फ बैंकों के पास थी, जिससे आम लोगों के लिए सोना जमा करना थोड़ा मुश्किल हो जाता था।
निवेशकों के लिए क्यों है ज़रूरी?
भारत दुनिया के सबसे बड़े सोने के इम्पोर्टर्स में से एक है। सोने का ज़्यादा इम्पोर्ट देश के करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) और भारतीय रुपये पर दबाव डालता है। सरकार चाहती है कि लोग अपना फिजिकल सोना बैंकों या ज्वैलर्स के पास जमा कराएं, ताकि इम्पोर्ट पर निर्भरता कम हो सके। अनुमान है कि अगर घर में रखे सोने का सिर्फ 5% भी स्कीम में आ जाए, तो लगभग $80 अरब से $90 अरब की लिक्विडिटी (liquidity) मिल सकती है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा बूस्ट होगा और विदेशी करेंसी पर निर्भरता कम करेगा।
पिछली योजना की कहानी और चुनौतियां
साल 2015 में पहली बार GMS लॉन्च की गई थी, लेकिन इसे वैसी सफलता नहीं मिली जैसी उम्मीद थी। मार्च 2025 तक केवल 38 टन सोना ही इस स्कीम के तहत मोनेटाइज हो पाया था। इसके कई कारण थे: लोग अपने पैतृक गहनों को पिघलाना नहीं चाहते थे, पुरानी होल्डिंग्स पर टैक्स की चिंता थी, और बैंकों को भी इस स्कीम से ज़्यादा फायदा नहीं दिख रहा था। सरकार को भी ब्याज और सोने की कीमत बढ़ने के कारण काफी घाटा उठाना पड़ा था।
जोखिम और आने वाली बाधाएं
नई स्कीम की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह लोगों की सोने को लेकर पुरानी सोच और व्यावहारिक दिक्कतों को कैसे दूर करती है। बहुत से लोग सोने को एक सुरक्षित निवेश मानते हैं और उसे पिघलाने या उस पर टैक्स अधिकारियों की नज़र पड़ने से हिचकिचाते हैं। इसके अलावा, ज्वैलर्स को कलेक्शन एजेंट बनाने पर उनकी टेस्टिंग और लॉजिस्टिक्स की ज़िम्मेदारी भी बढ़ जाएगी, जिससे स्कीम के संचालन में खर्च बढ़ सकता है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
निवेशकों को सरकारी गाइडलाइंस का इंतज़ार करना चाहिए कि टैक्स और ग्राहकों के लिए क्या इंसेंटिव दिए गए हैं। ज्वैलर्स के लिए लागू की जाने वाली प्रक्रियाएं, उनकी निगरानी और सोने की शुद्धता जांचने के मानक भी अहम होंगे। बाज़ार पर नज़र रखने वालों को यह भी देखना होगा कि क्या यह स्कीम आने वाले क्वार्टर्स में सोने के इम्पोर्ट पर कोई खास असर डाल पाती है, जिसका सीधा असर देश के ट्रेड बैलेंस (trade balance) और रुपये की मजबूती पर पड़ सकता है।
