सरकार ने 28 अक्टूबर की नीलामी के लिए गेहूं की मात्रा को 5,000 टन घटाकर **1.01 लाख टन** कर दिया है। FCI के पास पांच साल का उच्चतम स्टॉक होने के बावजूद, बाजार में सप्लाई की कमी से गेहूं की कीमतें **₹3,100 प्रति क्विंटल** के पार बनी हुई हैं, जिससे आटे के दाम पर दबाव है।
केंद्र सरकार ने अपनी साप्ताहिक गेहूं नीलामी रणनीति में बदलाव करते हुए 28 अक्टूबर के टेंडर के लिए कुल मात्रा 1.01 लाख टन तय की है। पिछली नीलामी की तुलना में यह 5,000 टन की कटौती है। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब देश के कई हिस्सों में गेहूं की थोक कीमतें ₹3,100 प्रति क्विंटल से ऊपर चल रही हैं, जो औसत स्तर से काफी ज्यादा है।
राज्यों के बीच आवंटन का पेंच
इस नीलामी में क्षेत्रीय असंतुलन साफ दिख रहा है। असम, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों के लिए कोटा कम किया गया है, जबकि महाराष्ट्र, पंजाब और पश्चिम बंगाल में इसे बढ़ाया गया है। कम आवंटन वाले राज्यों के फ्लोर मिलर्स का कहना है कि यह वितरण नीति उनकी स्थानीय प्रोसेसिंग क्षमता या मांग से मेल नहीं खाती, जिससे उनके सामने कामकाज का संकट खड़ा हो गया है।
रिकॉर्ड स्टॉक, फिर भी महंगाई क्यों?
बाजार के लिए सबसे बड़ी पहेली यह है कि देश के पास अनाज की कोई कमी नहीं है। फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) के आंकड़ों के मुताबिक, 1 सितंबर 2026 तक गेहूं का स्टॉक 479.92 लाख टन था, जो पिछले पांच वर्षों में सबसे ज्यादा है। 2025-26 के प्रोडक्शन ईयर में 120.66 मिलियन टन पैदावार के बावजूद, ओपन मार्केट के लिए सरकार की साप्ताहिक नीलामी ही सप्लाई का मुख्य जरिया है।
फ्लोर मिलर्स की चिंता
'Roller Flour Mills Association of Punjab' जैसे इंडस्ट्री निकायों ने 500 टन प्रति डिपो की सीमा पर सवाल उठाए हैं। मिलर्स का कहना है कि यह सीमा बहुत प्रतिबंधात्मक है और स्थानीय मिलों की संख्या के हिसाब से काफी कम है। पर्याप्त सरकारी सप्लाई न मिलने के कारण मिलर्स को ओपन मार्केट में महंगे गेहूं के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, जिससे आटे की प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ रही है।
इन्वेस्टर्स के लिए अब यह देखना अहम होगा कि क्या सरकार मिलों की संख्या के आधार पर आवंटन नीति में बदलाव करती है। यदि ओपन मार्केट में सप्लाई तंग रही, तो FMCG और फूड प्रोसेसिंग कंपनियों के लिए इनपुट कॉस्ट का दबाव बना रह सकता है।
