रिकॉर्ड डिमांड के पीछे की कहानी
साल 2025 में गोल्ड का कारोबार ₹6 ट्रिलियन की ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच गया। इस तूफानी तेजी की मुख्य वजह रही सोने की कुल डिमांड का 5,002 टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचना। यह पिछले सालों के मुकाबले एक बड़ी उछाल है, जो दर्शाता है कि निवेशक अब गोल्ड को सिर्फ एक एसेट नहीं, बल्कि एक स्ट्रैटेजिक और सेफ इन्वेस्टमेंट के तौर पर देख रहे हैं। दुनियाभर में बढ़ती जियोपॉलिटिकल टेंशन, करेंसी में अस्थिरता और ग्लोबल डेट का बढ़ना, इन सबने मिलकर गोल्ड की डिमांड को आसमान पर पहुंचा दिया। इसी साल गोल्ड की एवरेज प्राइस $3,431.5 प्रति औंस रही और 53 नए ऑल-टाइम हाई रिकॉर्ड हुए।
इन्वेस्टमेंट का दबदबा और निवेशकों का भरोसा
गोल्ड की इस कुल डिमांड में 2,175 टन अकेले इन्वेस्टमेंट डिमांड से आई, जो ज्वैलरी और कॉइन की खरीद से कहीं ज्यादा थी। जब निवेशक फिजिकल गोल्ड बेचने से हिचकिचाने लगे, तो यह उनके बढ़ते भरोसे का सीधा संकेत था। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के सचिन जैन के मुताबिक, कीमतों के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बावजूद, लोग फिजिकल गोल्ड को लंबे समय के लिए वैल्यू स्टोर के तौर पर रख रहे हैं, न कि जल्दी मुनाफा कमाने की कमोडिटी के तौर पर। ग्लोबल गोल्ड ईटीएफ (ETF) होल्डिंग्स में 801 टन की बढ़ोतरी हुई, जो इस इन्वेस्टमेंट टूल के लिए दूसरा सबसे मजबूत साल रहा।
मैक्रोइकोनॉमिक फैक्टर का असर
देश-दुनिया की आर्थिक स्थिति भी गोल्ड के लिए काफी सपोर्टिव रही। लगातार बढ़ती महंगाई (Inflation) और सेंट्रल बैंक्स द्वारा इंटरेस्ट रेट में कटौती की उम्मीदों ने गोल्ड को और भी आकर्षक बना दिया। फेडरल रिजर्व (US Central Bank) की मॉनेटरी पॉलिसी, खासकर रेट कट की संभावनाओं ने रियल इंटरेस्ट रेट्स को कम कर दिया, जिससे गोल्ड जैसे नॉन-यील्डिंग एसेट्स को होल्ड करने की अपॉर्चुनिटी कॉस्ट घट गई। साथ ही, विकसित देशों में बढ़ता कर्ज (Debt) भी करेंसी डिबेसमेंट और सॉवरेन डेट सस्टेनेबिलिटी को लेकर चिंताएं पैदा कर रहा है, जिससे निवेशक गोल्ड की ओर रुख कर रहे हैं।
सेफ हेवन या सट्टेबाजी?
जियोपॉलिटिकल अनिश्चितताओं और दूसरे मार्केट्स में वोलेटिलिटी के बीच गोल्ड ने अपना पारंपरिक 'सेफ हेवन' वाला रोल बखूबी निभाया। हालांकि, 2025 में गोल्ड की प्राइस एक्शन में सट्टेबाजी (Speculation) का असर भी दिखा। इक्विटी मार्केट्स में आई उथल-पुथल के बाद कुछ मुनाफावसूली (Profit Booking) और मार्जिन कॉल्स के चलते सेलिंग प्रेशर देखा गया। इसका मतलब है कि कीमतों में उतार-चढ़ाव सिर्फ गोल्ड की सेफ हेवन वैल्यू की वजह से नहीं, बल्कि ब्रॉड मार्केट लिक्विडिटी और सपेकुलेटिव ट्रेडिंग की वजह से भी था।
ग्लोबल और भारतीय बाजार का हाल
ग्लोबली, गोल्ड ने दूसरी एसेट क्लासेस जैसे बॉन्ड्स और इक्विटीज के साथ कम कोरिलेशन दिखाकर एक बेहतरीन डाइवर्सिफायर (Diversifier) के तौर पर अपनी वैल्यू साबित की। वहीं, भारत की बात करें तो रिकॉर्ड हाई कीमतों के चलते गोल्ड की डिमांड वॉल्यूम में 11% की गिरावट आई, लेकिन वैल्यू के मामले में यह 30% बढ़ गई। ज्वैलरी डिमांड के वॉल्यूम में 24% की भारी गिरावट देखी गई, जबकि इन्वेस्टमेंट डिमांड 17% बढ़ी। भारतीय गोल्ड ईटीएफ (ETFs) में जबरदस्त ग्रोथ देखी गई, होल्डिंग्स 65% बढ़कर 95 टन तक पहुंच गईं, जिससे भारत ग्लोबल गोल्ड ईटीएफ इनफ्लो में तीसरे नंबर पर आ गया।
एनालिस्ट्स का क्या है मानना?
फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस गोल्ड को लेकर काफी बुलिश (Bullish) हैं। जे.पी. मॉर्गन (J.P. Morgan) का अनुमान है कि 2026 की चौथी तिमाही तक गोल्ड की प्राइस औसतन $5,055 प्रति औंस तक पहुंच सकती है, और इसमें $6,000 तक जाने की क्षमता है। यूबीएस (UBS) ने तो इसे $6,200 तक पहुंचने का अनुमान लगाया है। यह सब सेंट्रल बैंक्स और बड़े इन्वेस्टर्स की लगातार खरीद और सप्लाई की कमी पर निर्भर करेगा।
आगे क्या और सेक्टर पर असर?
आने वाले समय में भी जियोपॉलिटिकल रिस्क और सेंट्रल बैंक्स की डिमांड गोल्ड में मजबूत इन्वेस्टमेंट बनाए रखने की उम्मीद है। भारत के लिए एक बड़ी खबर हाल ही में आया इंडिया-यूएस ट्रेड एग्रीमेंट है, जिससे भारतीय सामानों पर टैरिफ कम होने की उम्मीद है। जेम और ज्वैलरी सेक्टर के लिए यह डील इंपोर्ट ड्यूटी को कम कर सकती है, जिससे अमेरिका जैसे बड़े एक्सपोर्ट मार्केट में भारत की कॉम्पिटिटिवनेस और एक्सपोर्ट पोटेंशियल बढ़ सकता है। यह डेवलपमेंट ज्वैलरी सेगमेंट पर हाई गोल्ड प्राइस के वॉल्यूम प्रेशर को कम करने में मदद कर सकता है और भारतीय मैन्युफैक्चरर्स के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।
