Gold Price: सोने की ऐतिहासिक तेजी पर लगा ग्रहण! पॉलिसी शिफ्ट से मचा हाहाकार, $5600 से गिरी कीमतें

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Gold Price: सोने की ऐतिहासिक तेजी पर लगा ग्रहण! पॉलिसी शिफ्ट से मचा हाहाकार, $5600 से गिरी कीमतें
Overview

साल 2026 की शुरुआत में सोने ने जो तूफानी रफ्तार पकड़ी थी, उस पर अचानक ब्रेक लग गया है। ग्लोबल सेंट्रल बैंकों की पॉलिसी में आए बड़े बदलाव और मजबूत होते अमेरिकी डॉलर के चलते गोल्ड की कीमतों में भारी गिरावट आई है। सोने के दाम अपने रिकॉर्ड हाई से **20-25%** तक गिर गए हैं।

पॉलिसी में बदलाव का कहर: सोने की रफ्तार थमी, आई बड़ी गिरावट

साल 2026 की पहली तिमाही के आखिर में सोने की कीमतों में भारी गिरावट देखने को मिली। जो सोना जनवरी 2026 तक करीब $5,600 प्रति औंस के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था, वह मार्च के अंत तक $4,100-$4,300 की रेंज में आ गिरा। यह अपने पीक से 20-25% की बड़ी गिरावट थी, जिसने साल भर की सारी तेजी खत्म कर दी। यह गोल्ड के इतिहास में 1983 के बाद सबसे तेज साप्ताहिक गिरावट थी, जबकि चांदी में भी 15% से ज्यादा की सेंध लगी। यह घटना बताती है कि जब मॉनेटरी पॉलिसी और मैक्रो इकोनॉमिक्स में बड़ा बदलाव आता है, तो एसेट बबल्स कितने नाजुक हो सकते हैं।

गिरावट के मुख्य कारण: डॉलर, ब्याज दरें और सेंट्रल बैंकों का रुख

इस भारी गिरावट के पीछे कई वजहें थीं जिन्होंने सोने की पिछली तेजी की नींव हिला दी। सबसे पहले, भारी लिवरेज्ड पोजीशन (leveraged positions) से मुनाफावसूली (profit-taking) शुरू हुई, जिसे स्टॉप-लॉस ऑर्डर और मार्जिन कॉल ने और तेज कर दिया। वहीं, मध्य पूर्व (Middle East) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों (geopolitical tensions) ने तेल की कीमतों को बढ़ाया, जिससे इंफ्लेशनरी प्रेशर (inflationary pressure) बढ़ा।

इस बढ़ते इन्फ्लेशन को काबू करने के लिए दुनिया भर के सेंट्रल बैंकों ने सख्त रुख अपनाया। यूएस फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) ने संकेत दिए कि वे ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा रखेंगे। इससे बॉन्ड यील्ड (bond yields) बढ़े और अमेरिकी डॉलर मजबूत हुआ। डॉलर, जो 2025 में लगभग 10% गिरा था, 2026 की शुरुआत में तेजी से सुधरा, जिससे सोने की मांग पर सीधा असर पड़ा।

स्ट्रक्चरल बदलाव और भारत पर असर

इसके अलावा, उभरते बाजारों (emerging markets) के सेंट्रल बैंकों ने अपने रिजर्व में विविधता लाने के लिए सोना खरीदना कम कर दिया। 2025 के अंत तक अमेरिकी कर्ज $39 ट्रिलियन के करीब पहुंच गया था, जिसने इन देशों को अपने रिजर्व बढ़ाने के लिए सोने की ओर खींचा था, लेकिन 2026 की शुरुआत में यह खरीदारी धीमी पड़ गई। गोल्ड-बेस्ड एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड (ETFs) से भी लगातार पैसे बाहर निकले, जो पहले की जमावट पैटर्न से वापसी का संकेत था।

भारत जैसे बड़े सोने के उपभोक्ता देशों के लिए, 2025 की तेजी और बाद की अस्थिरता ने आर्थिक चुनौतियां खड़ी कीं। इंपोर्ट बिल बढ़ने से ट्रेड डेफिसिट (trade deficit) बढ़ा और महंगाई भी बढ़ी, खासकर ज्वेलरी की कीमतों पर। जहां 2025 में सोने की असली यील्ड (real yields) नेगेटिव थी, वहीं 2026 में बढ़ती ब्याज दरों और मजबूत डॉलर के कारण रियल यील्ड बढ़ने लगी, जिससे सोने की अपील कम हो गई।

आगे की राह: अनिश्चितता बनी हुई है

हालांकि मार्च 2026 के आखिर में $4,000 के स्तर के आसपास कुछ खरीदारी के संकेत मिले, लेकिन निकट भविष्य में सोने की चाल अभी भी अनिश्चित बनी हुई है। कीमतों में रिकवरी इस बात पर निर्भर करेगी कि ग्लोबल लिक्विडिटी (liquidity) की स्थिति कैसी रहती है, महंगाई कितनी बनी रहती है, और सेंट्रल बैंक अपनी मॉनेटरी पॉलिसी का क्या रास्ता चुनते हैं।

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