फाइनेंशियल प्लानर्स पोर्टफोलियो के रिस्क को बैलेंस करने के लिए **10%** गोल्ड में निवेश की सलाह देते हैं। जहां शेयर बाजार ग्रोथ देता है, वहीं गोल्ड महंगाई और मार्केट की गिरावट के खिलाफ एक कवच का काम करता है।
पोर्टफोलियो मैनेजमेंट में आमतौर पर शेयर और फिक्स्ड-इनकम एसेट्स का संतुलन बनाया जाता है। लेकिन इसमें गोल्ड को शामिल करना स्थिरता की गारंटी माना जाता है। जब शेयर बाजार में बड़ी गिरावट आती है, तो गोल्ड की कीमतें अक्सर स्थिर रहती हैं या उनमें तेजी आती है, जो एक फाइनेंशियल बफर की तरह काम करता है। यही वजह है कि एक्सपर्ट्स अपने पोर्टफोलियो में 10% गोल्ड को परमानेंट एंकर के रूप में रखने की सलाह देते हैं।
रिस्क कम करने का जरिया
गोल्ड का मुख्य उद्देश्य कम समय में मुनाफा कमाना नहीं, बल्कि पोर्टफोलियो के कुल रिस्क को कम करना है। जब अर्थव्यवस्था की ग्रोथ सुस्त पड़ती है या महंगाई पैसे की वैल्यू घटाती है, तो गोल्ड एक स्टोर ऑफ वैल्यू के रूप में काम आता है। यही कारण है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) समेत दुनिया भर के केंद्रीय बैंक अपनी संपत्ति सुरक्षित रखने के लिए गोल्ड रिजर्व लगातार बढ़ा रहे हैं।
डिजिटल गोल्ड के जरिए निवेश
भारत में फिजिकल ज्वेलरी खरीदने के बजाय गोल्ड में निवेश के कई स्मार्ट तरीके मौजूद हैं:
- Sovereign Gold Bonds (SGBs): ये निवेशकों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं, क्योंकि ये गोल्ड प्राइस के साथ कैपिटल एप्रिसिएशन तो देते ही हैं, साथ ही सालाना ब्याज भी मिलता है।
- Gold ETFs और EGRs: अगर आप ब्याज के बजाय लिक्विडिटी को प्राथमिकता देते हैं, तो Gold ETFs और Electronic Gold Receipts (EGRs) बेहतर हैं। इन्हें शेयर की तरह आसानी से खरीदा और बेचा जा सकता है और डिजिटल होने के कारण चोरी या शुद्धता की कोई चिंता नहीं रहती।
ध्यान रखने योग्य बातें
याद रखें, गोल्ड शेयर बाजार की तरह दौलत बनाने का जरिया नहीं है। इसमें डिविडेंड या कॉरपोरेट ग्रोथ नहीं मिलती। इसके अलावा, भारत में गोल्ड की कीमतें डॉलर की वैल्यू पर भी निर्भर करती हैं। अगर रुपया डॉलर के मुकाबले मजबूत होता है, तो वैश्विक स्तर पर गोल्ड स्थिर होने के बावजूद भारतीय निवेशकों को मिलने वाला रिटर्न कम हो सकता है।
गोल्ड को ट्रेडिंग का जरिया न मानकर इसे लॉन्ग टर्म स्टेबलाइजर की तरह देखें, जो पोर्टफोलियो के खराब दौर में सहारा देता है।
