सोना-चांदी रिकॉर्ड ऊंचाई पर: भू-राजनीतिक तनाव ने बढ़ाई कीमतें, वोलैटिलिटी का दौर जारी

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
सोना-चांदी रिकॉर्ड ऊंचाई पर: भू-राजनीतिक तनाव ने बढ़ाई कीमतें, वोलैटिलिटी का दौर जारी
Overview

कीमती धातुओं सोने और चांदी की कीमतें भू-राजनीतिक तनाव के चलते रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। सोमवार को भारत में सोने का भाव **₹1.66 लाख** प्रति 10 ग्राम और चांदी का भाव **₹2.86 लाख** प्रति किलोग्राम के पार चला गया।

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मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने सोने और चांदी को सुरक्षित निवेश (safe haven) के तौर पर और ज़्यादा आकर्षक बना दिया है। इसी वजह से सोमवार, 2 मार्च 2026 को, भारत में सोने की कीमत में ₹7,000 प्रति 10 ग्राम का उछाल आया और यह ₹1.66 लाख पर पहुंच गई। वहीं, चांदी में ₹20,000 प्रति किलोग्राम की भारी बढ़ोतरी देखी गई, जो ₹2.86 लाख प्रति किलोग्राम तक चढ़ गई।

यह उछाल सिर्फ आज की बात नहीं है। कैलेंडर वर्ष 2025 में ही सोने की कीमतों में 70% और चांदी में हैरतअंगेज 125% की तेजी आई थी। वहीं, जनवरी 2026 तक, सोने में 24% और चांदी में 30% का इजाफा हो चुका है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी यही हाल है। 3 मार्च 2026 को स्पॉट गोल्ड (spot gold) $5,417 प्रति औंस के ऐतिहासिक उच्च स्तर को छू गया, जबकि चांदी $90 प्रति औंस के करीब कारोबार कर रही थी। यह सब वैश्विक अनिश्चितता और संघर्ष का सीधा असर है।

इस जियोपॉलिटिकल टेंशन का असर कच्चे तेल (crude oil) पर भी दिख रहा है। ब्रेंट क्रूड (Brent crude) 2 मार्च 2026 को $79 प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा था, जिससे भारत जैसी आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ा है।

ऐतिहासिक तौर पर, मध्य पूर्व में संघर्षों ने हमेशा सोने-चांदी को सुरक्षित निवेश के तौर पर बढ़ावा दिया है। खासकर 2023 के आखिर में इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष के दौरान, क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंकाओं से सोने की कीमतों में 10% से ज़्यादा का उछाल आया था।

इस बार स्थिति और ज़्यादा गंभीर है। निवेशक ज़्यादातर जोखिम वाली संपत्तियों (riskier assets) से निकलकर इन कीमती धातुओं में पैसा लगा रहे हैं। हालांकि, बॉन्ड मार्केट (bond market) में भी सुरक्षित निवेश की तलाश रहती है, लेकिन इस समय सोने-चांदी जैसी भौतिक संपत्तियों (tangible assets) की मांग ज़्यादा हावी दिख रही है। 3 मार्च 2026 को 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड (10-year Treasury yield) करीब 4.05% के आसपास ही रहा, लेकिन निवेशक अभी भी कीमती धातुओं को तरजीह दे रहे हैं। डॉलर इंडेक्स (US Dollar Index) में भी उतार-चढ़ाव देखा गया, लेकिन फिजिकल एसेट्स की चमक बरकरार है। गोल्ड ईटीएफ (Gold ETF) और सिल्वर ईटीएफ (Silver ETF) में भी निवेशकों का रुझान बढ़ा है, जो वैल्यू (value) को स्टोर करने का जरिया ढूंढ रहे हैं।

कीमती धातुओं में यह उछाल जटिल मैक्रोइकोनॉमिक (macroeconomic) संकेतों के बीच हो रहा है। एक तरफ कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से महंगाई (inflation) की चिंताएं बढ़ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) द्वारा ब्याज दरें घटाए जाने की उम्मीदें टल रही हैं। अब सितंबर में दरें कटने की संभावना है, जबकि पहले जुलाई का अनुमान था। ज़्यादा ब्याज दरें सोने जैसी बिना यील्ड वाली संपत्तियों (non-yielding assets) को कम आकर्षक बनाती हैं। हालांकि, भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण सुरक्षित निवेश की भारी मांग इन चिंताओं पर हावी हो गई है।

कच्चे तेल की कीमतों और सोने के बीच का संबंध भी महत्वपूर्ण है। मध्य पूर्व संघर्षों के दौरान, खासकर जब सप्लाई में रुकावट का खतरा हो, यह सहसंबंध (correlation) 0.65 से 0.85 तक रहता है, जो इस बार भी देखा जा रहा है।

विश्लेषकों की राय अलग-अलग है, लेकिन ज़्यादातर का मानना है कि बाजार में वोलैटिलिटी बनी रहेगी। कुछ विश्लेषकों को उम्मीद है कि 2026 में चांदी की औसत कीमत $81 प्रति औंस रहेगी, जो 2025 के औसत से दोगुनी से भी ज़्यादा है। वे सप्लाई की कमी और इंडस्ट्रियल डिमांड (industrial demand) को इसका कारण बता रहे हैं। हालांकि, कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव और औद्योगिक इस्तेमाल में सब्स्टिट्यूशन (substitution) की चिंताओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

हालांकि, इस तूफानी तेजी के बीच कुछ जोखिम भी हैं जिन पर ध्यान देना ज़रूरी है। 2025 में पहले से ही भारी उछाल (चांदी में 150% से ज़्यादा और सोने में 70% से ज़्यादा) के बाद, जनवरी 2026 तक सोने में 24% और चांदी में 30% की साल-दर-साल (year-to-date) वृद्धि ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या कीमतें अपने बुनियादी स्तर (fundamental shifts) से ज़्यादा बढ़ गई हैं? अगर भू-राजनीतिक तनाव अचानक कम हो जाता है, तो यह जोखिम प्रीमियम (risk premium) तेज़ी से खत्म हो सकता है, जिससे कीमतों में भारी गिरावट आ सकती है, जैसा कि अतीत में भी कई बार देखा गया है।

इंडस्ट्रियल डिमांड की कमजोरी: चांदी का इस्तेमाल सोलर पैनल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे उद्योगों में होता है। लेकिन, लगातार बढ़ती कीमतें उद्योगों को इसका विकल्प (substitution) खोजने पर मजबूर कर सकती हैं। रिपोर्टों से पता चलता है कि कुछ औद्योगिक अनुप्रयोगों में 'थ्रिफ्टिंग और सब्स्टिट्यूशन' (thrifting and substitution) की चिंताएं बढ़ रही हैं, जो समय के साथ मांग को कम कर सकती हैं। यह तब और प्रासंगिक हो जाता है जब वैश्विक आर्थिक विकास धीमा पड़ने लगे।

कमोडिटी बनाम फाइनेंशियल एसेट: स्टॉक के विपरीत, जहां P/E रेश्यो (P/E ratio) जैसी चीजें होती हैं, कमोडिटी (commodity) कीमतें सप्लाई में रुकावट और स्पेकुलेटिव फ्लो (speculative inflows) के आधार पर तेज़ी से बदल सकती हैं। यह 'फ्लाइट टू क्वालिटी' (flight to quality) शायद आंतरिक मूल्य से ज़्यादा 'सुरक्षा' की धारणा पर आधारित है, जो तेज़ी से पलट सकती है। 2025 में सिल्वर ईटीएफ (Silver ETF) में भारी इनफ्लो (inflow) कीमतों को बढ़ाने का कारण बना, लेकिन अगर ये इनफ्लो रिवर्स (reverse) हो जाते हैं तो यह एक बड़ा जोखिम साबित हो सकता है।

बाजार की भविष्यवाणियों के अनुसार, आने वाले समय में सोने-चांदी में वोलैटिलिटी बनी रहेगी। अगर भू-राजनीतिक अस्थिरता जारी रहती है, तो कीमतों में और भी बढ़ोतरी की संभावना है। लेकिन, कीमतों में पहले से ही हुई भारी चढ़त, आर्थिक चुनौतियों का खतरा और तनाव कम होने की संभावना, एक अनिश्चित तस्वीर पेश करती है। निवेशकों को लगातार बदलते भू-राजनीतिक हालात, महंगाई के आंकड़े और केंद्रीय बैंकों की नीतियों पर नज़र रखने की सलाह दी जाती है, क्योंकि ये ही कारक आने वाले हफ्तों और महीनों में कीमती धातुओं की कीमतों की दिशा तय करेंगे। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि 2026 के मध्य तक चांदी 2026 की शुरुआत के अपने उच्चतम स्तर को पार कर सकती है, लेकिन कीमतों में अस्थिरता और औद्योगिक सब्स्टिट्यूशन की चिंताएं बनी रहेंगी।

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