अगस्त में Gold और Silver की कीमतों में जोरदार उछाल देखने को मिला, लेकिन क्या यह तेजी टिकाऊ है? ग्लोबल लेवल पर सेंट्रल बैंकों की भारी खरीदारी इसे सहारा दे रही है, जबकि ऊँची ब्याज दरों के कारण भारतीय रिटेल निवेशक अब सुरक्षित और बेहतर रिटर्न वाले एसेट्स की ओर शिफ्ट हो रहे हैं।
क्या वाकई गोल्ड की चमक बरकरार रहेगी?
अगस्त 2026 की रैली ने गोल्ड और सिल्वर के निवेशकों में उत्साह भर दिया था, लेकिन अब बाजार में इसे लेकर खींचतान तेज हो गई है। एक तरफ जहाँ इंस्टिट्यूशनल एनालिस्ट बुलिश हैं, वहीं दूसरी तरफ मैक्रो-इकोनॉमिक चुनौतियां भी कम नहीं हैं। 2026 की दूसरी तिमाही में ग्लोबल सेंट्रल बैंकों ने 288.9 टन सोना खरीदा, जो कीमतों को एक मजबूत सपोर्ट लेवल दे रहा है। वहीं, सिल्वर के लिए 'गोल्ड-टू-सिल्वर रेश्यो' 69 के आसपास बना हुआ है, जिसे कई एनालिस्ट सिल्वर के लिए एक अंडरवैल्यूड स्थिति मान रहे हैं।
क्यों बढ़ रहा है जोखिम?
कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि हालिया तेजी का कारण सिर्फ अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड का बायबैक था, जिससे यील्ड्स में अस्थायी गिरावट आई। लेकिन असली समस्या, यानी ग्लोबल फिस्कल डेफिसिट, अभी भी बरकरार है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर में हो रहे निवेश की वजह से ब्याज दरें हाई रहने की उम्मीद है। चूँकि गोल्ड से कोई फिक्स्ड डिविडेंड या इंटरेस्ट नहीं मिलता, इसलिए निवेशक अब बॉन्ड्स और मनी-मार्केट जैसे विकल्पों को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं।
भारत में बदल रहा है रिटेल निवेशकों का मूड
भारतीय मार्केट में रिटेल सेंटीमेंट पूरी तरह बदल चुका है। जुलाई 2026 में प्रेशियस-मेटल फंड्स में नेट इनफ्लो घटकर सिर्फ ₹4,084 करोड़ रह गया, जो जून में ₹8,680 करोड़ के स्तर पर था। इसके उलट, मनी-मार्केट इंस्ट्रूमेंट्स में ₹1.40 लाख करोड़ का भारी निवेश हुआ है। यह साफ दर्शाता है कि भारतीय निवेशक अब रिस्क के बजाय स्टेबिलिटी और रेगुलर इनकम को प्राथमिकता दे रहे हैं।
निवेशकों के लिए क्या है जरूरी?
आने वाले समय में ग्लोबल इंटरेस्ट रेट्स का रुख सबसे अहम होगा। यदि दरें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो गोल्ड जैसे नॉन-यील्डिंग एसेट्स पर दबाव बना रहेगा। निवेशकों को सेंट्रल बैंक की खरीदारी और सिल्वर के मामले में इंडस्ट्रियल डिमांड पर पैनी नजर रखनी चाहिए।
