निवेश का बदला समीकरण
यह साफ तौर पर दिखाता है कि निवेशक किस तरह से 'सेफ-हेवन एसेट्स' (Safe-haven assets) की ओर भाग रहे हैं। वैश्विक अनिश्चितताओं और इक्विटी मार्केट में वोलेटिलिटी (Volatility) के बीच, कीमती धातुओं ने अपनी जगह मजबूत की है।
कीमती धातुओं में रिकॉर्ड निवेश
जनवरी 2026 में, गोल्ड ईटीएफ (Gold ETFs) में अकेले ₹24,040 करोड़ का शुद्ध इनफ्लो (Net Inflow) आया, वहीं सिल्वर ईटीएफ (Silver ETFs) ने ₹9,463 करोड़ जुटाए। यह सब मिलकर, ₹1,441 करोड़ के एसआईपी (SIP) निवेश के साथ, इक्विटी फंड्स (Equity Funds) को पीछे छोड़ने वाली एक ऐतिहासिक चाल है। गौर करने वाली बात है कि यह पहली बार हुआ है जब गोल्ड ईटीएफ का इनफ्लो इक्विटी फंड्स से ज्यादा रहा है। गोल्ड और सिल्वर ईटीएफ का कुल एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) ₹3 लाख करोड़ के पार चला गया है, जो पिछले पांच महीनों में करीब तीन गुना बढ़ गया है। इस दौरान 12 लाख से ज्यादा नए निवेशक इन ईटीएफ से जुड़े, जो उद्योग के लिए एक बड़ी उपलब्धि है।
इस बड़े बदलाव के पीछे की वजहें
इस बड़े बदलाव के पीछे कई मैक्रो-इकोनॉमिक (Macro-economic) कारण हैं। लगातार बनी हुई जियोपॉलिटिकल टेंशन (Geopolitical tensions), ट्रेड अनिश्चितता (Trade uncertainties) और डॉलर की कमजोरी जैसी चीजों ने सोने और चांदी को 'सेफ-हेवन' का दर्जा दिलाया है। साथ ही, बड़े सेंट्रल बैंकों से ब्याज दरें कम होने की उम्मीदों ने सोने जैसी नॉन-यील्डिंग एसेट्स को पकड़ने की अपॉर्च्युनिटी कॉस्ट (Opportunity Cost) को भी कम कर दिया है। विश्लेषकों का कहना है कि इन वजहों से कीमती धातुओं ने भारतीय इक्विटी को पीछे छोड़ा है। हालांकि, निफ्टी 50 (Nifty 50) का 22.4x के पी/ई (P/E) पर ट्रेड करना लंबी अवधि में ग्रोथ का अच्छा मौका दे सकता है, लेकिन फिलहाल बाजार की सेंटीमेंट (Sentiment) पूरी तरह से डिफेंसिव एसेट्स की तरफ झुक गई है। जनवरी 2026 में गोल्ड ईटीएफ होल्डिंग 110 टन से ऊपर पहुंच गई है।
क्या हैं जोखिम और आगे क्या?
हालांकि, कुछ चिंताएं भी हैं। यह संभव है कि निवेशक सोने की रैली के चरम पर प्रदर्शन (Performance) का पीछा कर रहे हों। कीमतों में तेज उछाल के कारण वोलेटिलिटी (Volatility) भी बढ़ी है। जनवरी के अंत से कुछ गोल्ड ईटीएफ में गिरावट भी देखी गई है। ईटीएफ इनफ्लो की वजह से सोने-चांदी का आयात बढ़ने से देश के ट्रेड बैलेंस (Trade Balance) पर दबाव बढ़ रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि लंबी अवधि की बात करें तो ऐतिहासिक रूप से कॉर्पोरेट अर्निंग्स ग्रोथ (Corporate Earnings Growth) के चलते इक्विटी ने हमेशा कीमती धातुओं को पीछे छोड़ा है। इसलिए, यह मौजूदा ट्रेंड शायद इक्विटी से स्थायी दूरी बनाने की बजाय एक अस्थायी फंड ट्रांसफर (Fund transfer) हो सकता है।
भविष्य की राह
2026 के आगे देखें तो, आउटलुक (Outlook) मिला-जुला है। वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच कीमती धातुएं पोर्टफोलियो के लिए एक अच्छा हेज (Hedge) बनी रह सकती हैं और कुछ स्थिरता दे सकती हैं। वहीं, कुछ जानकारों का मानना है कि जल्द ही इक्विटी बाजार अपनी पुरानी लीडरशिप वापस पा लेगा। उम्मीद है कि निफ्टी 50 (Nifty 50) अगले एक साल में करीब 10% का प्राइस रिटर्न दे सकता है। दोनों ही एसेट क्लासेस में वोलेटिलिटी बनी रहने की उम्मीद है। एक संतुलित पोर्टफोलियो के लिए, आमतौर पर कीमती धातुओं में 10-15% का अनुशासित आवंटन (Disciplined allocation) करने की सलाह दी जाती है।