गुरुवार, 20 अगस्त 2026 को भारतीय सोना और चांदी ETF में जबरदस्त तेजी देखने को मिली। ग्लोबल बुलियन कीमतों में आई उछाल के चलते ये फंड्स **4%** तक चढ़ गए। यह तेजी US Treasury के लॉन्ग-टर्म डेट बायबैक बढ़ाने के फैसले से आई, जिससे बॉन्ड यील्ड घटी और डॉलर कमजोर हुआ।
US Treasury के फैसले का गोल्ड-सिल्वर पर असर
अमेरिकी ट्रेजरी (US Treasury) ने अपने कर्ज प्रबंधन को लेकर एक बड़ा ऐलान किया है। ट्रेजरी 9 सितंबर 2026 से 10 से 30 साल की सरकारी बॉन्ड्स के लिए लिक्विडिटी सपोर्ट बायबैक ऑपरेशन को बढ़ाकर कम से कम $4 बिलियन प्रति ऑपरेशन करने की योजना बना रहा है।
इस कदम का मकसद मार्केट में लिक्विडिटी बढ़ाना और उधार लेने की लागत को कंट्रोल करना है। कीमती धातुओं के बाजार के लिए यह एक बड़ा बूस्टर साबित हुआ है। जब लॉन्ग-टर्म बॉन्ड यील्ड गिरती है, तो गोल्ड और सिल्वर जैसी बिना ब्याज वाली एसेट्स की मांग बढ़ जाती है। इसके अलावा, इस फैसले ने अमेरिकी डॉलर पर भी दबाव डाला, जिससे डॉलर-डिनॉमिनेटेड कमोडिटीज जैसे सोना और चांदी अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के लिए सस्ते हो गए, जिसने कीमतों को और सपोर्ट दिया।
मेटल ETF का प्रदर्शन
आज के कारोबार में चांदी ETF ने गोल्ड ETF को पीछे छोड़ दिया, जो मेटल की ऊंची प्राइस वोलेटिलिटी को दर्शाता है। Tata Silver ETF में 4.23% की बढ़ोतरी देखी गई, जबकि Nippon India Silver ETF और SBI Silver ETF जैसे प्रमुख फंड्स में करीब 4.05% का इजाफा हुआ।
गोल्ड ETF में भी अच्छी भागीदारी देखी गई। ICICI Prudential, Nippon India, SBI, और Tata द्वारा मैनेज किए जाने वाले फंड्स में 2.2% से 2.4% के बीच बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह उछाल सुरक्षित निवेश (safe-haven assets) की ओर निवेशकों के सकारात्मक सेंटिमेंट को दिखाता है।
जोखिम और ध्यान देने योग्य बातें
हालांकि मौजूदा माहौल कीमती धातुओं के लिए सपोर्टिव है, लेकिन निवेशकों को इस एसेट क्लास से जुड़े जोखिमों पर भी ध्यान देना चाहिए। कीमती धातुएं अमेरिकी महंगाई के आंकड़ों और फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को लेकर नीतियों के संकेतों के प्रति काफी संवेदनशील रहती हैं। महंगाई या रेट कट की उम्मीदों में किसी भी बदलाव से कीमतों में अचानक गिरावट आ सकती है।
इसके अलावा, भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं, खासकर मध्य-पूर्व जैसे क्षेत्रों में तनाव, वैश्विक ऊर्जा कीमतों और मॉनेटरी पॉलिसी की उम्मीदों को प्रभावित कर सकती हैं। ये फैक्टर बाजार में अचानक वोलेटिलिटी ला सकते हैं।
ETF में निवेश करने वालों के लिए यह भी जरूरी है कि वे अंडरलाइंग मेटल की कीमतों के अलावा फंड-स्पेसिफिक फैक्टर्स पर भी नजर रखें। इनमें ट्रैकिंग एरर (ETF के प्रदर्शन और मेटल की वास्तविक कीमत के बीच का अंतर) और एक्सपेंस रेशियो (जो नेट रिटर्न को प्रभावित करता है) शामिल हैं। जैसे-जैसे वैश्विक हालात बदलते हैं, इस रैली की स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि बॉन्ड यील्ड कम रहती है या नहीं और अमेरिकी डॉलर कितना मजबूत बना रहता है।
