'स्ट्रक्चरल रीप्राइसिंग फेज' की शुरुआत?
सोने की कीमत $5,000 प्रति औंस के आंकड़े को पार कर गई है, जो Motilal Oswal Financial Services (MOFSL) के अनुसार एक अहम मोड़ है। ब्रोकरेज की रिपोर्ट में इसे किसी सामान्य चक्रीय तेजी (cyclical upswing) की बजाय, एक नए सुपरसाइकिल की शुरुआत यानी 'स्ट्रक्चरल रीप्राइसिंग फेज' (structural repricing phase) कहा गया है। इसका मतलब है कि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बड़े और स्थायी बदलाव आ रहे हैं। 26 फरवरी 2026 तक, सोने का भाव लगभग $5,186.06 था। MOFSL का अनुमान है कि Comex गोल्ड अगले 12 महीनों में $6,000 प्रति औंस तक जा सकता है, और अगर भू-राजनीतिक व वित्तीय दबाव बढ़ता रहा तो मध्यम अवधि में $7,500 तक भी पहुंच सकता है। डॉलर-केंद्रित एसेट्स (dollar-centric assets) से लगातार दूरी बनाना और फिजिकल सप्लाई (physical supply) में कमी इस अनुमान का समर्थन करते हैं।
मौद्रिक भरोसे की कमी (Monetary Trust Deficit)
मौजूदा गोल्ड रैली की सबसे खास बात यह है कि यह तब भी जारी है जब रियल इंटरेस्ट रेट (real interest rates) पॉजिटिव थे। 2023 से 2025 के दौरान, जब सोने की कीमतें आमतौर पर गिरनी चाहिए थीं, तब भी यह बढ़ीं। यह साफ दिखाता है कि निवेशकों की चिंता सिर्फ महंगाई से आगे बढ़कर, बढ़ते वैश्विक कर्ज (global debt) और वित्तीय व मौद्रिक प्रणालियों (fiscal and monetary frameworks) की लंबी अवधि की स्थिरता को लेकर है। MOFSL के Manav Modi जैसे विश्लेषकों का कहना है कि रियल रिटर्न (real returns) को अब सिर्फ पॉलिसी-संचालित और अस्थायी माना जा रहा है, जिससे सोने को रखने की लागत (cost of holding gold) कम हो गई है और यह व्यापक वित्तीय अस्थिरता (financial instability) के खिलाफ एक बचाव (safeguard) के तौर पर अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है। यह पारंपरिक वित्तीय प्रणालियों में भरोसे की गहरी कमी को दर्शाता है, जो निवेशकों को सोने जैसी ठोस संपत्तियों (tangible assets) की ओर खींच रहा है, जिसे अब सट्टा हेज (speculative hedge) से ज्यादा एक स्ट्रक्चरल पोर्टफोलियो एलोकेशन (structural portfolio allocation) माना जा रहा है।
धातुओं की चाल: सोना बनाम अन्य
सोने के इस शानदार प्रदर्शन के बीच, अन्य कीमती धातुओं की चाल थोड़ी अलग है। उदाहरण के लिए, चांदी (Silver) में भी मजबूत तेजी देखी जा रही है। J.P. Morgan का अनुमान है कि 2026 में चांदी की औसत कीमत $81 प्रति औंस रह सकती है, जो 2025 के औसत से दोगुनी से भी ज्यादा है। इसकी वजह औद्योगिक मांग (industrial demand) और सप्लाई की कमी है। प्लैटिनम (Platinum) के लिए भी अनुमान मजबूत हैं, Bank of America Securities ने 2026 के लिए $2,450/oz का लक्ष्य रखा है, जो लगातार बाजार में कमी और ऑटोमोटिव मांग पर आधारित है। हालांकि, सोने की तेजी मुख्य रूप से मौद्रिक (monetary) और रिजर्व विविधीकरण (reserve diversification) जैसे कारकों से प्रेरित है, जो इसे औद्योगिक धातुओं से अलग करती है। केंद्रीय बैंकों (central banks) द्वारा सोने की निरंतर खरीद (sustained demand) एक प्रमुख अंतर बना हुआ है।
⚠️ जोखिमों पर एक नजर (The Bear Case)
हालांकि ज्यादातर विशेषज्ञ सोने की तेजी के पक्ष में हैं, लेकिन हालिया मूल्य में भारी उतार-चढ़ाव (volatility) भी देखा गया है, जिसमें तेजी और गिरावट दोनों शामिल हैं। अमेरिकी डॉलर (U.S. dollar) का मजबूत होना सोने पर दबाव डाल सकता है, क्योंकि पारंपरिक तौर पर मजबूत डॉलर सोने को अंतर्राष्ट्रीय खरीदारों के लिए महंगा बना देता है। अगर केंद्रीय बैंक ब्याज दरें बढ़ाते हैं, तो सोने जैसी गैर-लाभकारी संपत्तियों (non-yielding assets) को रखने की अवसर लागत (opportunity cost) बढ़ सकती है, जिससे मांग कम हो सकती है। Goldman Sachs का कहना है कि सोने का प्रदर्शन व्यापक कमोडिटी सुपरसाइकिल (commodity supercycle) से अलग है, यानी इसकी कीमत के पीछे औद्योगिक मांग से ज्यादा मौद्रिक भरोसा (monetary trust) है। गोल्ड ईटीएफ (Gold ETFs) जैसे iShares Gold Trust (IAU) में भी लंबे समय में अच्छे रिटर्न के बावजूद, ऐतिहासिक रूप से बड़ी गिरावटें देखी गई हैं।
सर्वसम्मत तेजी का रुख (Consensus Bull Run)
ज्यादातर बड़ी वित्तीय संस्थाएं सोने की इस तेजी के रुख पर सहमत हैं। J.P. Morgan का अनुमान है कि 2026 के अंत तक सोने की कीमत $6,300 प्रति औंस तक पहुंच सकती है, वहीं लंबी अवधि का लक्ष्य $4,500 रखा गया है। Goldman Sachs ने 2026 के अंत के लिए $5,400 का लक्ष्य दिया है, जबकि Bank of America का मानना है कि 12 महीनों में यह $6,000 तक पहुंच सकता है। UBS करीब $6,200 का अनुमान लगा रहा है, और BMO Securities 2026 के लिए $6,500/oz तक का बुल-केस (bull-case) बता रहा है। इन सभी अनुमानों का आधार केंद्रीय बैंकों द्वारा 1,000 टन से अधिक वार्षिक खरीद और निजी निवेशकों का विविधीकरण (diversification) है, जो वैश्विक नीतिगत जोखिमों (global policy risks) और मुद्रा अवमूल्यन (currency devaluation) से बचाव की तलाश में हैं। डी-डॉलरIZATION (de-dollarization) की मौजूदा प्रवृत्ति भी इस मांग को और बढ़ा रही है, क्योंकि देश अमेरिकी डॉलर से इतर अपनी रिजर्व संपत्ति (reserve assets) को विविध बनाना चाहते हैं।