सोने की कीमतों में **3.5%** की हालिया गिरावट के बाद अब स्थिरता देखी जा रही है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण सुरक्षित निवेश के रूप में मांग बनी हुई है, लेकिन अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना ने दबाव बनाए रखा है।
बाजार में जारी है रस्साकशी
1 सितंबर, 2026 को सोने की कीमतों में कुछ हद तक स्थिरता लौटी है। पिछले दो सत्रों में सोने में करीब 3.5% की गिरावट देखी गई थी, जिससे उबरने की कोशिशें जारी हैं। इस समय पीली धातु दो बड़े वैश्विक कारकों के बीच फंसी हुई है: पहला, मिडिल ईस्ट में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव जिसके कारण निवेशक 'सेफ-हेवन' के तौर पर सोना खरीद रहे हैं, और दूसरा, अमेरिका का सख्त ब्याज दर रुख।
क्यों बढ़ रही है महंगाई की चिंता?
मिडिल ईस्ट में तनाव, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य, जॉर्डन और यूएई के पास बढ़ रही अस्थिरता ने ग्लोबल एनर्जी मार्केट को हिला दिया है। क्रूड ऑयल की कीमतें $85 प्रति बैरल के पार निकल गई हैं। तेल की बढ़ती कीमतें मुद्रास्फीति (inflation) को फिर से हवा दे सकती हैं, जिससे फेडरल रिजर्व के लिए ब्याज दरों को काबू में रखना एक बड़ी चुनौती बन गया है।
फेड का सख्त रुख और निवेशकों की रणनीति
फेड चेयर केविन वॉर्श ने महंगाई को कंट्रोल करने के लिए सख्त संकेत दिए हैं। बाजार में 60% से ज्यादा संभावना जताई जा रही है कि सितंबर में ब्याज दरें बढ़ सकती हैं। चूंकि सोने पर कोई ब्याज (interest) नहीं मिलता, इसलिए बढ़ती ब्याज दरों के दौर में निवेशक अक्सर अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स की ओर रुख करते हैं।
भारतीय निवेशकों के लिए अहम संकेत
अगस्त 2026 में सोना करीब 10% की बढ़त पर रहा है। भारतीय बाजार में MCX फ्यूचर्स और फिजिकल गोल्ड की कीमतें सीधे ग्लोबल संकेतों से प्रभावित होती हैं। आने वाले दिनों में अमेरिकी लेबर डेटा, जैसे कि बुधवार को आने वाली ADP नॉन-फार्म एम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट और शुक्रवार को बेरोजगारी के आंकड़े, यह तय करेंगे कि अमेरिकी इकॉनमी में और बढ़ोतरी की गुंजाइश है या फेड अपने रुख में नरमी लाएगा।
