सोने की कीमतों में भारी गिरावट आई है और यह पिछले 7 महीनों के सबसे निचले स्तर पर पहुँच गया है। निवेशकों के बीच इस बिकवाली की मुख्य वजह अमेरिका में संभावित इंटरेस्ट रेट हाइक और अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ता तनाव है।
क्या हुआ?
बुधवार, 1 जुलाई को सोने की कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई, जो पिछले 7 महीनों का सबसे निचला स्तर है। COMEX गोल्ड फ्यूचर 1.13% गिरकर $3,993 प्रति औंस पर आ गया। वहीं, चांदी की कीमतों में और भी बड़ी गिरावट देखी गई, जो 2.93% लुढ़क कर $57.735 प्रति औंस पर बंद हुई। इन कीमती धातुओं में इस व्यापक बिकवाली ने ग्लोबल मार्केट में निवेशकों के सेंटिमेंट को दर्शाया है, जो अब ऐसे एसेट्स से दूरी बना रहे हैं जिनमें कोई ब्याज नहीं मिलता।
फेडरल रिजर्व का आउटलुक क्यों है अहम?
सोने पर मुख्य दबाव अमेरिकी ब्याज दरों (Interest Rates) के बदलते समीकरणों से आ रहा है। क्लीवलैंड फेडरल रिजर्व की प्रेसिडेंट बेथ हैमक (Beth Hammack) ने संकेत दिया है कि अगर महंगाई (Inflation) बढ़ती रही तो ब्याज दरों में और वृद्धि संभव है। आम तौर पर, जब ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो सोना कम आकर्षक हो जाता है क्योंकि यह कोई ब्याज या डिविडेंड नहीं देता। इसके अलावा, ऊंची दरें अक्सर अमेरिकी डॉलर को मजबूत करती हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के लिए सोना महंगा हो जाता है। CME FedWatch टूल के अनुसार, सितंबर तक ब्याज दरें बढ़ने की 67% संभावना है।
भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions)
अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर चल रही अनिश्चितता ने भी बाजार में अस्थिरता बढ़ा दी है। ऐसी खबरें हैं कि ईरानी अधिकारियों ने वरिष्ठ अमेरिकी दूतों के साथ तत्काल बैठकों को अस्वीकार कर दिया है, जिससे भू-राजनीतिक चिंताएं बढ़ गई हैं। युद्धविराम की शर्तों और परमाणु कार्यक्रमों को लेकर चल रही ये अनसुलझी समस्याएं एक ऐसे 'रिस्क-ऑफ' माहौल को बढ़ावा दे रही हैं, जहां निवेशक अक्सर सुरक्षित या अधिक लिक्विड एसेट्स की ओर रुख करते हैं।
भारतीय निवेशकों के लिए क्या है मतलब?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर भारतीय निवेशकों पर भी पड़ता है, क्योंकि यह घरेलू कीमतों को प्रभावित करता है। जहां सोना वैश्विक स्तर पर डॉलर में ट्रेड होता है, वहीं भारत में इसकी कीमत रुपये की मजबूती या कमजोरी पर भी निर्भर करती है। फेड के संभावित रेट हाइक से अमेरिकी डॉलर मजबूत हो सकता है, जो रुपये पर दबाव डाल सकता है। इसलिए, अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में गिरावट का मतलब यह नहीं है कि भारत में खुदरा कीमतें तुरंत या उसी अनुपात में कम हो जाएंगी, खासकर अगर करेंसी एक्सचेंज रेट में उतार-चढ़ाव हो।
आगे क्या देखना है?
बाजार की नजरें अब अमेरिका से आने वाले आर्थिक आंकड़ों पर हैं। निवेशक जून के ADP एम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट और गुरुवार को आने वाले नॉन-फार्म पेरोल (Non-Farm Payrolls) के आंकड़ों पर बारीकी से नजर रखेंगे, जो लेबर मार्केट की सेहत का अंदाजा देंगे। इसके अलावा, यूरोज़ोन और अमेरिका के मैन्युफैक्चरिंग PMI और महंगाई के आंकड़े भी ग्लोबल मॉनेटरी पॉलिसी और सोने की भविष्य की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
