गुरुवार को सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट आई है। इसकी मुख्य वजह अमेरिकी फेडरल रिजर्व (Fed) का वह फैसला है, जिसमें उन्होंने ब्याज दरों को स्थिर रखा है लेकिन यह संकेत दिया है कि महंगाई को काबू करने के लिए इन्हें लंबे समय तक ऊंचा बनाए रखा जाएगा। इस कदम से डॉलर और ट्रेजरी यील्ड्स मजबूत हुए हैं, जिससे सोना-चांदी निवेशकों के लिए कम आकर्षक हो गए हैं।
क्या हुआ?
अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नई नीति घोषणा के बाद गुरुवार को सोने और चांदी की कीमतों में नरमी देखी गई। केंद्रीय बैंक ने अपनी प्रमुख ब्याज दरों को 3.5%-3.75% पर अपरिवर्तित रखने का फैसला किया। हालांकि यह फैसला बाजार की उम्मीदों के मुताबिक था, लेकिन फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (FOMC) ने यह भी संकेत दिया कि वे पहले की अपेक्षा ज्यादा लंबे समय तक इस कड़ी ब्याज दर वाले माहौल को बनाए रख सकते हैं। नीति निर्माताओं ने लगातार बढ़ती महंगाई को इस सतर्क रुख का मुख्य कारण बताया है। इसी के चलते, COMEX गोल्ड फ्यूचर्स 0.94% गिरकर $4,340.40 प्रति औंस पर आ गए, जबकि सिल्वर फ्यूचर्स 1.74% की गिरावट के साथ $69.535 प्रति औंस पर कारोबार कर रहे हैं।
निवेशकों के लिए इसका क्या मतलब है?
जब फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को ऊंचा रखता है, तो अक्सर सोना और चांदी जैसी कीमती धातुओं पर दबाव बनता है। इन धातुओं से न तो कोई ब्याज मिलता है और न ही डिविडेंड। ऐसे में, जब सरकारी बॉन्ड और सेविंग अकाउंट्स पर ज्यादा रिटर्न मिलने लगता है, तो निवेशक सोने के बजाय इन्हें चुनना पसंद कर सकते हैं। इसके अलावा, केंद्रीय बैंक का सख्त रुख (यानी दरों को ऊंचा रखने का संकेत) अक्सर अमेरिकी डॉलर को मजबूत करता है और ट्रेजरी यील्ड्स को बढ़ाता है। चूंकि सोना और चांदी डॉलर में ही ट्रेड होते हैं, तो मजबूत डॉलर अन्य मुद्राओं का उपयोग करने वाले खरीदारों के लिए इन धातुओं को और महंगा बना देता है, जिससे अक्सर मांग और कीमत में गिरावट आती है।
भारतीय बाजार के लिए क्या है खास?
भारतीय निवेशकों के लिए, सोने और चांदी की अंतरराष्ट्रीय कीमतों की चाल अक्सर मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर घरेलू बाजार की कीमतों को दिशा देती है। जब अंतरराष्ट्रीय कीमतें गिरती हैं, तो भारतीय कीमतें भी अक्सर उसी राह पर चलती हैं। हालांकि, घरेलू कीमतें रुपये-डॉलर के विनिमय दर पर भी निर्भर करती हैं। भारतीय रुपये के मुकाबले अमेरिकी डॉलर का मजबूत होना कभी-कभी वैश्विक सोने की कीमतों में गिरावट के असर को स्थानीय स्तर पर कम कर सकता है। भारत में निवेशक आमतौर पर इन वैश्विक संकेतों पर नजर रखते हैं, क्योंकि ये स्थानीय बाजार में बुलियन की कीमतों के लिए मुख्य ट्रेंड प्रदान करते हैं।
भू-राजनीतिक संतुलन
फेडरल रिजर्व की नीति से दबाव के बावजूद, सोना और चांदी की कीमतों में बहुत ज्यादा गिरावट नहीं आई है। इसका एक बड़ा कारण पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव हैं। निवेशक अनिश्चितता के समय अक्सर सोने को एक सुरक्षित निवेश (safe-haven asset) के तौर पर देखते हैं। अमेरिका-ईरान के बीच संभावित युद्धविराम की खबरों पर बारीकी से नजर रखी जा रही है, क्योंकि इस क्षेत्र में किसी भी तरह का तनाव सोने की मांग को तेजी से बदल सकता है, जो कि ब्याज दरों की नीतियों से पड़ने वाले दबाव को सीमित करने में एक सपोर्ट फैक्टर का काम कर सकता है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
आगे चलकर, बाजार की नजरें अमेरिका से आने वाले आर्थिक आंकड़ों पर टिकी रहेंगी, खासकर महंगाई और रोजगार से संबंधित रिपोर्टें। ये संकेतक फेडरल रिजर्व के भविष्य के नीतिगत फैसलों को काफी हद तक प्रभावित करते हैं। निवेशक फेड अधिकारियों की टिप्पणियों पर भी नजर रख सकते हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि अगली नीतिगत चाल ब्याज दर में वृद्धि होगी या दरों में अंततः ढील दी जाएगी। हालांकि ऊंची ब्याज दरों वाले माहौल में सोने पर अक्सर दबाव रहता है, लेकिन आर्थिक आंकड़ों और भू-राजनीतिक स्थिरता के बीच संतुलन ही कीमतों की अल्पकालिक दिशा तय करेगा।
