बीते 24 घंटों में सोने और चांदी की कीमतों में एक बड़ी और जोरदार रिकवरी आई है। COMEX पर सोना 5% से ज़्यादा उछलकर $4,850 प्रति औंस के स्तर को पार कर गया। वहीं, चांदी की चाल तो और भी तेज रही, यह 11% से ज़्यादा चढ़कर $85 प्रति औंस के ऊपर कारोबार कर रही है। चांदी में यह तेजी हाल के निचले स्तरों से 20% से ज़्यादा की रिकवरी है, जिसने पिछले दिनों आई करीब 40% की गिरावट को कुछ हद तक कम कर दिया है।
इस रिकवरी का संदर्भ समझना ज़रूरी है। कीमती धातुओं में आई पिछली तूफानी गिरावट की मुख्य वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा फेडरल रिजर्व (Fed) के अगले प्रमुख के तौर पर केविन वॉर्श (Kevin Warsh) को नॉमिनेट करना था। वॉर्श को बाज़ार में एक 'hawkish' यानी सख्त मौद्रिक नीति अपनाने वाले व्यक्ति के तौर पर देखा जाता है। इस नॉमिनेशन ने निवेशकों, खासकर चीन के सट्टेबाजों (speculators) को घबरा दिया, जिससे उन्होंने तेज़ी से अपनी पोजीशन का सफाया करना शुरू कर दिया। यह स्थिति, जनवरी में भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं और करेंसी के अवमूल्यन (currency debasement) के डर से आई तेज़ी से बिलकुल अलग थी।
इसके बावजूद, सोने (Gold) का 'safe-haven' यानी सुरक्षित निवेश के तौर पर इसका महत्व बरकरार है। वैश्विक अनिश्चितताओं, बढ़ते फिस्कल रिस्क (fiscal risks) और निवेशकों की फिजिकल एसेट्स (physical assets) के प्रति बढ़ती रुचि ने सोने को मजबूती दी है। केंद्रीय बैंकों (central banks) की लगातार खरीदारी और फेडरल रिजर्व की स्वतंत्रता को लेकर बनी चिंताएं भी सोने की मांग को बल दे रही हैं, जो कीमत में उतार-चढ़ाव के बीच भी एक आधार प्रदान करती हैं।
भारतीय बाज़ारों की बात करें तो, MCX पर चांदी का मार्च वायदा (March expiry) ₹2,32,500 प्रति किलोग्राम पर कारोबार कर रहा था, जिसमें 1.6% की मामूली गिरावट देखी गई। वहीं, MCX पर सोने का अप्रैल वायदा (April delivery) ₹1,43,000 प्रति 10 ग्राम पर था, जो 0.69% नीचे था। दिल्ली में 24-कैरेट सोने का बेंचमार्क रेट ₹1,42,640 प्रति 10 ग्राम रहा।
बाज़ार विश्लेषकों का कहना है कि फिलहाल कीमतों में उतार-चढ़ाव (volatility) बना रहेगा। केडिया एडवाइजर्स के फाउंडर अजय केडिया (Ajay Kedia) के मुताबिक, निवेशक कीमतों में गिरावट आने पर खरीदारी (dip-buying) कर सकते हैं, जिससे चांदी की कीमतों को और सहारा मिल सकता है। यह बाज़ार के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है, क्योंकि बाज़ार अभी भी फेडरल पॉलिसी के संकेतों को समझने की कोशिश कर रहा है।