ग्लोबल मार्केट में सोने की कीमतों में **9%** की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। US Federal Reserve द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की संभावनाओं और बढ़ते बॉन्ड यील्ड के कारण निवेशक गोल्ड से दूरी बना रहे हैं, जिससे भाव **$4,300** के सपोर्ट लेवल पर आ गए हैं।
बाजार में मंदी का मुख्य कारण
कीमती धातुओं में यह गिरावट अमेरिकी मौद्रिक नीति में बदलाव की वजह से है। स्पॉट गोल्ड अपने तीन महीने के उच्चतम स्तर $4,697 से फिसलकर $4,300 प्रति औंस के क्रिटिकल सपोर्ट लेवल पर आ गया है। निवेशक अब गोल्ड जैसी नॉन-यिल्डिंग एसेट्स के बजाय US Treasury बॉन्ड्स की ओर रुख कर रहे हैं, जो बेहतर रिटर्न दे रहे हैं।
फेड का रुख और ब्याज दरें
इस उठापटक की मुख्य वजह फेडरल रिजर्व के अधिकारी केविन वॉर्श (Kevin Warsh) का बयान है। जैक्सन होल संगोष्ठी में दिए गए उनके 'हॉकिश' संकेतों ने मार्केट को हिला दिया है। मार्केट अब 70% मानकर चल रहा है कि 16 सितंबर, 2026 को होने वाली बैठक में फेड 25 बेसिस पॉइंट की ब्याज दरों में बढ़ोतरी करेगा। डॉलर की मजबूती ने भी सोने को महंगा बना दिया है, जिससे कीमतों पर दबाव और बढ़ गया है।
कच्चे तेल और जियोपॉलिटिकल टेंशन
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल $96 प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है। आमतौर पर ऐसी स्थिति में गोल्ड को सेफ-हेवन माना जाता है, लेकिन फिलहाल महंगाई की चिंता सेंट्रल बैंकों को ब्याज दरें ऊंची रखने पर मजबूर कर रही है, जो सोने के लिए नकारात्मक है।
भारतीय निवेशकों के लिए क्या है स्थिति?
भारत में ग्लोबल गिरावट का असर तो दिख ही रहा है, साथ ही सरकार द्वारा सोने की खपत पर संयम बरतने की अपील और इंपोर्ट ड्यूटी बदलने की अटकलों ने बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी है।
टेक्निकल आउटलुक
अगर सोना $4,300 का सपोर्ट लेवल नहीं बचा पाया, तो कीमतें $4,200 से $4,220 के दायरे में जा सकती हैं। निवेशकों की नजर अब अमेरिकी लेबर डेटा और इंफ्लेशन रिपोर्ट्स पर है। जब तक इकोनॉमी में नरमी के स्पष्ट संकेत नहीं मिलते, तब तक दबाव बना रह सकता है।
