ग्लोबल दबाव से कीमती धातुएं औंधे मुंह गिरीं
कीमती धातुओं, सोना और चांदी, की कीमतों में भारी गिरावट देखी जा रही है। अमेरिका से आए महंगाई के आंकड़े इस गिरावट का एक प्रमुख कारण हैं, जिससे फेडरल रिजर्व के अगले कदमों पर चिंताएं बढ़ गई हैं। इसके अलावा, रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे भू-राजनीतिक जोखिमों (Geopolitical Risks) के कारण एनर्जी मार्केट में भी हलचल है, जिसका सीधा असर सुरक्षित निवेश मानी जाने वाली धातुओं पर दिख रहा है। इन वैश्विक चिंताओं के बीच, भारत सरकार द्वारा सोना और चांदी पर आयात शुल्क में वृद्धि ने भी कीमती धातुओं की फिजिकल डिमांड को झटका दिया है और कीमतों को और नीचे धकेल दिया है।
महंगाई का सैलाब और भू-राजनीतिक तनावों का असर
अमेरिकी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index) अप्रैल 2026 में सालाना 3.8% बढ़कर मई 2023 के बाद उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। थोक महंगाई (Wholesale Prices) में भी तेज बढ़ोतरी देखी गई। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ (Strait of Hormuz) में सप्लाई बाधित होने से ऊर्जा की कीमतों में उछाल आया है, जिसने महंगाई को और भड़काया है। इससे यह उम्मीदें बढ़ गई हैं कि फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को फिलहाल ऊंचा बनाए रख सकता है। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड्स (Treasury Yields) में भी बढ़ोतरी हुई है, 10-वर्षीय यील्ड 14 मई, 2026 तक करीब 4.47% पर पहुंच गई। जब यील्ड्स बढ़ते हैं, तो डॉलर भी मजबूत होता है, जिससे डॉलर में ट्रेड होने वाले सोना और चांदी अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के लिए महंगे हो जाते हैं। स्पॉट गोल्ड की कीमतों में 4% से अधिक की गिरावट आई, जो करीब $4,773 से घटकर $4,557 प्रति औंस पर आ गया। चांदी की कीमतों में 12% से अधिक की तेज गिरावट देखी गई, जो अपने शिखर से लगभग $78 प्रति औंस पर आ गई। भारत में, MCX गोल्ड फ्यूचर्स 2% गिरकर ₹1,58,872 प्रति 10 ग्राम पर आ गया, और सिल्वर फ्यूचर्स 6% की गिरावट के साथ ₹2,73,601 प्रति किलोग्राम पर ट्रेड कर रहे हैं। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) ने अक्टूबर तक सप्लाई बाधित रहने की चेतावनी दी है, जिससे ब्रेंट क्रूड ऑयल करीब $109 और WTI क्रूड ऑयल $105 के आसपास बना हुआ है।
भारत के आयात शुल्क में बढ़ोतरी ने बढ़ाई मुश्किलें
भारत सरकार ने सोने और चांदी के आयात पर सख्त नियम लागू कर दिए हैं। 13 मई, 2026 को, प्रभावी 6% के रेट से बढ़ाकर आयात शुल्क 15% कर दिया गया है। इसमें 10% का बेसिक कस्टम्स ड्यूटी (Basic Customs Duty) और 5% का एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट सेस (Agriculture Infrastructure and Development Cess) शामिल है। सरकार का लक्ष्य आर्बिट्राज ट्रेडिंग (Arbitrage Trading) को कम करना और विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) पर दबाव को कम करना है। हालांकि, इससे भारत में कीमती धातुओं का आयात महंगा हो गया है, जो मांग को प्रभावित कर सकता है। कुछ बाजार विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम से फिजिकल खरीदारी का एक प्रमुख सहारा कम हो सकता है। ज्वैलरी स्टॉक्स जैसे कल्याण जूलर्स (Kalyan Jewellers) पर पहले से ही दबाव देखा जा रहा था, और वे 52-हफ्ते के निचले स्तर पर पहुंच गए हैं, जिसका आंशिक कारण पिछले ड्यूटी हिक और बाजार का समग्र सेंटिमेंट है।
बाजार की चाल और विश्लेषकों की राय
हालांकि अमेरिकी महंगाई के आंकड़ों ने तत्काल गिरावट को ट्रिगर किया, यह स्थिति भू-राजनीतिक सप्लाई शॉक और सख्त मौद्रिक नीति के बीच निरंतर संघर्ष को दर्शाती है। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ में व्यवधानों के कारण तेल की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं, जो महंगाई और भू-राजनीतिक जोखिमों में योगदान कर रही हैं। IEA का अनुमान है कि यदि तनाव जारी रहा तो 2026 तक तेल की सप्लाई में बड़ी कमी आ सकती है, जो ऊर्जा की कीमतों और महंगाई को और बढ़ाएगा। सोना पारंपरिक रूप से महंगाई से बचाव (Inflation Hedge) का काम करता है, लेकिन ऊंचे यील्ड्स सोने जैसी नॉन-यील्डिंग एसेट्स को होल्ड करना कम आकर्षक बना देते हैं, क्योंकि अवसर लागत (Opportunity Cost) बढ़ जाती है। एशिया में मजबूत इनफ्लो के बावजूद, अप्रैल के दौरान उत्तरी अमेरिका में गोल्ड ईटीएफ (Gold ETFs) में अलग-अलग मांग देखी गई। वहीं, चांदी में हाल ही में 18% की तेजी देखी गई है, जो सट्टेबाजी (Speculative Trading) और तांबे जैसी अन्य धातुओं में सप्लाई की समस्याओं के कारण है, जो औद्योगिक मांग का संकेत दे सकती है। विश्लेषकों के अनुमानों में भिन्नता है, कुछ का अनुमान है कि केंद्रीय बैंकों से लंबी अवधि की मांग और संरचनात्मक कारकों के कारण सोना 2026 के अंत तक $5,000-$5,400 तक पहुंच सकता है। अन्य लोग ब्याज दर के दृष्टिकोण के कारण निकट अवधि में कमजोरी की उम्मीद करते हैं।
सोना और चांदी के लिए निकट-अवधि की चुनौतियां
निकट भविष्य में सोना और चांदी के लिए आउटलुक चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। अमेरिका में लगातार बढ़ती महंगाई और फेडरल रिजर्व द्वारा उच्च ब्याज दरों को लंबे समय तक बनाए रखने की उम्मीदें मुश्किल हालात पैदा कर रही हैं। ट्रेजरी यील्ड्स में वृद्धि, आय-उत्पन्न करने वाले निवेशों की तुलना में बिना-आय वाले बुलियन (Bullion) को होल्ड करना कम आकर्षक बनाती है। भारत द्वारा आयात शुल्क में भारी बढ़ोतरी (लगभग 6% से 15% तक) एक प्रमुख बाजार में फिजिकल डिमांड के लिए एक महत्वपूर्ण बाधा खड़ी करती है। यह नीति, जिसका उद्देश्य उच्च तेल की कीमतों और कमजोर रुपए के दौर में विदेशी मुद्रा बचाने का है, मांग को कम कर सकती है और यदि कीमतें बहुत अधिक बढ़ती हैं तो उपभोक्ताओं को अनौपचारिक बाजारों की ओर धकेल सकती है। जबकि मध्य पूर्व का तनाव आम तौर पर सोने का समर्थन करता है, यह वर्तमान में सख्त मौद्रिक नीति और भारत की आयात लागतों के प्रभाव से छाया हुआ है। व्यापक कमोडिटी बाजार भी कमजोरी दिखा रहे हैं, मजबूत मांग के बजाय सप्लाई की समस्याओं के कारण तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव आ रहा है। यह स्टैगफ्लेशन (Stagflation) का जोखिम दर्शाता है। टाइटन (Titan) और कल्याण जूलर्स (Kalyan Jewellers) जैसी ज्वैलरी कंपनियां, जो भारतीय उपभोक्ता खर्च पर निर्भर हैं, ने कीमतों में तेज गिरावट देखी है, जो इन आर्थिक और नीतिगत दबावों के बारे में बाजार की चिंता को दर्शाता है।
आगे क्या: कीमती धातुओं का भविष्य
विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार महंगाई की चिंताओं और फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती में देरी की उम्मीदों को देखते हुए, कीमती धातुओं को निकट अवधि में निरंतर दबाव का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, दीर्घकालिक मांग लगातार वैश्विक भू-राजनीतिक जोखिमों और संस्थानों, विशेषकर केंद्रीय बैंकों से निरंतर रुचि से समर्थित हो सकती है। यूएस-चीन व्यापार वार्ता के परिणाम एक महत्वपूर्ण कारक हैं; तनाव कम होने से सुरक्षित-आश्रयों (Safe Havens) की मांग कम हो सकती है, जबकि बढ़े हुए तनाव इसे बढ़ा सकते हैं। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ में व्यवधान कितने समय तक जारी रहता है और तेल की कीमतों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है, यह भी महंगाई और बाजार की भावना को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करेगा।