एक साथ हुई बिकवाली
17 फरवरी 2026 को कीमती धातुओं (Precious Metals) में बड़ी गिरावट देखी गई, जिसका असर घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों बाजारों पर पड़ा। COMEX पर गोल्ड फ्यूचर्स 2.18% गिरकर $4936.1 पर आ गए, जबकि सिल्वर फ्यूचर्स में तो 4.50% की तेज गिरावट आई और यह $74.455 पर पहुँच गए। भारतीय बाजारों की बात करें तो MCX पर गोल्ड फ्यूचर्स 1.18% लुढ़ककर ₹1,52,939.00 हो गए, वहीं सिल्वर फ्यूचर्स 2.37% की नरमी के साथ ₹2,34,199.00 पर बंद हुए। यह बिकवाली का दबाव लगभग सभी घरेलू गोल्ड और सिल्वर एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ETFs) पर भी देखा गया। इन फंड्स में आमतौर पर 1% से 4% तक की गिरावट दर्ज की गई, जो कीमती धातु बाजार में फैली मंदी की भावना को दर्शाता है। खास बात यह रही कि सिल्वर ईटीएफ़ ने गोल्ड ईटीएफ़ के मुकाबले ज्यादा खराब प्रदर्शन किया, जहाँ Edelweiss Silver ETF में 2.86% की गिरावट आई, वहीं Baroda BNP Paribas Gold ETF ने अपने सेगमेंट में सबसे ज्यादा 4.20% की गिरावट दर्ज की।
ईटीएफ़ पर दबाव
फ्यूचर्स मार्केट में आई गिरावट का सीधा असर कई घरेलू ईटीएफ़ पर पड़ा। सिल्वर ईटीएफ़ सेगमेंट में, Tata Silver Exchange Traded Fund 2.00% टूटा, Nippon India Silver ETF 2.21% और Zerodha Silver ETF 2.07% नीचे आए। ICICI Prudential Silver ETF, HDFC Silver ETF और Groww Silver ETF जैसे अन्य प्रमुख फंड्स भी करीब 2% तक गिरे। बिकवाली की आक्रामकता ऐसी थी कि Edelweiss Silver ETF ने सिल्वर सेगमेंट में सबसे बड़ी 2.86% की गिरावट दर्ज की। गोल्ड ईटीएफ़ सेगमेंट में भी गिरावट समान रूप से फैली हुई थी। Tata Gold Exchange Traded Fund 1.68% नीचे आया, Nippon India ETF Gold BeES 1.86% और Zerodha Gold ETF भी 1.86% गिरे। Baroda BNP Paribas Gold ETF ने गोल्ड ईटीएफ़ में सबसे तेज 4.20% की गिरावट देखी। दोनों तरह के ईटीएफ़ में इस व्यापक गिरावट ने सिस्टमैटिक रिस्क एवर्जन (Systematic Risk Aversion) का संकेत दिया।
मंदी के कारण: मैक्रो फैक्टर और रेगुलेटरी बदलाव
17 फरवरी 2026 को सोने-चांदी की कीमतों में आई तेज और एक साथ हुई गिरावट की एक वजह एशियाई बाजारों में हॉलिडे के चलते कम लिक्विडिटी (Liquidity) और अमेरिकी डॉलर का मजबूत होना भी था। यह व्यापक रिस्क-ऑफ सेंटीमेंट (Risk-off Sentiment) फ्यूचर्स और ईटीएफ़ दोनों में देखा गया, जो सामान्य प्राइस डिस्कवरी (Price Discovery) से परे के कारकों को दर्शाता है। हाल ही में, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने गोल्ड और सिल्वर ईटीएफ़ के लिए सर्किट लिमिट मैकेनिज्म (Circuit Limit Mechanism) में बदलाव का प्रस्ताव दिया था। इसका उद्देश्य T-2 NAV-आधारित लिमिट्स से हटकर T-1 रेफरेंस प्राइसिंग (Reference Pricing) पर जाकर कमोडिटी मार्केट के रियल-टाइम उतार-चढ़ाव के साथ ईटीएफ़ की प्राइस डिस्कवरी को सिंक्रोनाइज़ (Synchronize) करना था। यह रेगुलेटरी डेवलपमेंट ऐसे समय में आया जब निवेशकों की भागीदारी काफी मजबूत थी और इन ईटीएफ़ में भारी इनफ्लो (Inflow) देखा गया था। पिछले महीने गोल्ड ईटीएफ़ में लगभग ₹24,000 करोड़ और सिल्वर ईटीएफ़ में ₹9,000 करोड़ से ज्यादा का निवेश आया था। रिवाइज्ड प्राइस बैंड (Revised Price Band) की ओर यह कदम, जिसमें गोल्ड और सिल्वर ईटीएफ़ के लिए शुरुआती ±6% का प्रस्ताव था, जो ±20% तक बढ़ सकता है, वो वोलेटिलिटी (Volatility) के खिलाफ एक सक्रिय रेगुलेटरी रुख का संकेत देता है, खासकर जनवरी 2026 के अंत में आए बड़े उतार-चढ़ाव के बाद। वैश्विक स्तर पर, फरवरी 2026 में ECB जैसे केंद्रीय बैंकों ने स्थिर ब्याज दरें बनाए रखीं, और महंगाई नियंत्रण में मानी जा रही है, जिससे आमतौर पर गोल्ड जैसे नॉन-यील्डिंग सेफ-हेवन (Non-yielding safe-haven) एसेट्स की अपील कम हो जाती है। इसके अलावा, 17 फरवरी 2026 को US डॉलर इंडेक्स (US Dollar Index) बढ़कर 97.0820 हो गया, यह वो चाल है जो अक्सर गोल्ड और सिल्वर जैसी डॉलर-डिनॉमिनेटेड कमोडिटीज पर दबाव बनाती है।
भविष्य का आउटलुक: सावधानी बनी हुई है
17 फरवरी 2026 को कीमतों में हुई बड़ी गिरावट के बाद, सोना और चांदी के लिए आउटलुक सतर्क रूप से अनिश्चित बना हुआ है। फ्यूचर्स और ईटीएफ़ में हुई आक्रामक बिकवाली शॉर्ट-टर्म रिस्क-ऑफ माहौल का या मार्केट डायनामिक्स (Market Dynamics) में एक अधिक फंडामेंटल शिफ्ट (Fundamental Shift) का संकेत दे सकती है। विश्लेषकों का कहना है कि इक्विटी मार्केट में लगातार मजबूती या अधिक हॉकिश मॉनेटरी पॉलिसी (Hawkish Monetary Policy) का रुख कीमती धातुओं पर और दबाव डाल सकता है। इसके विपरीत, महंगाई की चिंताओं के दोबारा बढ़ने या किसी अप्रत्याशित भू-राजनीतिक अस्थिरता (Geopolitical Instability) से सेफ-हेवन की मांग फिर से बढ़ सकती है। इन ईटीएफ़ का प्रदर्शन आने वाले हफ्तों में मैक्रोइकोनॉमिक इंडिकेटर्स (Macroeconomic Indicators), केंद्रीय बैंक की नीतियों और निवेशकों की रिस्क एपेटाइट (Risk Appetite) से करीब से जुड़ा रहेगा। मार्केट पार्टिसिपेंट्स (Market Participants) दिशात्मक संकेतों के लिए आगामी आर्थिक डेटा रिलीज और भू-राजनीतिक विकास पर बारीकी से नज़र रखेंगे।