वैश्विक स्तर पर आर्थिक और भू-राजनीतिक कारणों ने Gold और Silver की कीमतों पर गहरा असर डाला। 15 मई 2026 को, भले ही होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में रुकावटों के चलते कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें $105 प्रति बैरल के पार चली गईं, लेकिन Gold और Silver की मांग पर इन घटनाओं का असर नहीं हुआ। इसके बजाय, अमेरिकी डॉलर इंडेक्स (Dollar Index) का 99.2 के करीब पहुंचना और मजबूत अमेरिकी आर्थिक आंकड़े हावी रहे।
अमेरिकी GDP में 2.0% की बढ़ोतरी और PCE महंगाई दर का 3.5% सालाना रहना, फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) द्वारा ब्याज दरों में लगातार बढ़ोतरी की उम्मीदों को बढ़ा रहा है। इसने डॉलर को और मजबूत किया और Gold-Silver जैसी सुरक्षित निवेश माने जाने वाली धातुओं को निवेशकों के लिए कम आकर्षक बना दिया।
इस वैश्विक दबाव के बीच, भारत सरकार के एक बड़े फैसले ने कीमती धातुओं के बाजार में और हलचल मचा दी। 13 मई 2026 से प्रभावी, Gold और Silver पर कुल इम्पोर्ट ड्यूटी को 6% से अचानक बढ़ाकर 15% कर दिया गया है। यह कदम गैर-जरूरी आयात को रोकने और विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) को बचाने के लिए उठाया गया है, क्योंकि भारतीय रुपया (Indian Rupee) डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर लगभग 95.8 पर आ गया था, जो पिछले साल में 11.96% की गिरावट दर्शाता है। भारत, जो कीमती धातुओं का एक बड़ा खरीदार है, के इस नीतिगत बदलाव का तत्काल प्रभाव यह हुआ कि घरेलू बाजारों में Gold और Silver की कीमतें बढ़ गईं और बढ़ी हुई इम्पोर्ट लागत के कारण खुदरा विक्रेताओं ने कीमतों में छूट देना शुरू कर दिया।
यह देखना वाकई हैरानी भरा था कि होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20% जोखिम में डालती है, के बावजूद कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में उछाल आया, लेकिन Gold और Silver गिर गए। ऐतिहासिक रूप से, ऐसी आपूर्ति बाधाएं और महंगाई को लेकर चिंताएं कीमती धातुओं को सहारा देती हैं, लेकिन इस बार बाजार का ध्यान डॉलर की मजबूती पर केंद्रित रहा, जिसे अमेरिकी ब्याज दरों में बढ़ोतरी की उम्मीदों और भारत की आयात नीति ने और हवा दी। अंतर्राष्ट्रीय स्पॉट Gold की कीमतें लगभग $4,562 प्रति औंस तक गिर गईं, जबकि Silver की कीमतें लगभग $76 प्रति औंस के आसपास बनी रहीं। MCX पर भी Gold फ्यूचर्स में इसी तरह की गिरावट देखी गई, जबकि Silver फ्यूचर्स में और तेज गिरावट आई।
कीमती धातुओं के लिए अब कई अन्य कारण भी मंदी का संकेत दे रहे हैं। भारत की आक्रामक ड्यूटी बढ़ोतरी, जिसका उद्देश्य रुपये को सहारा देना है, अवैध तस्करी को बढ़ावा देने का जोखिम भी पैदा करती है। साथ ही, अमेरिका की मजबूत अर्थव्यवस्था और फेडरल रिजर्व की सख्त मौद्रिक नीति के चलते अमेरिकी डॉलर में लगातार मजबूती बनी हुई है, जो डॉलर-आधारित कमोडिटीज, जिनमें Gold और Silver भी शामिल हैं, पर भारी पड़ रही है। यह डॉलर की मजबूती Gold और Silver को दुनिया भर के खरीदारों के लिए उनकी स्थानीय मुद्राओं में महंगा बनाती है, जिससे मांग घटती है। भले ही होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति तेल की कीमतों को ऊपर धकेल रही है, लेकिन यह दर्शाता है कि केवल भू-राजनीतिक जोखिम कीमती धातुओं को तब तक नहीं बढ़ा सकते जब तक कि मजबूत मौद्रिक नीति और व्यापार-संचालित कार्रवाई जैसे कारक हावी हों।
भविष्य को लेकर विश्लेषकों की राय मिली-जुली है। कुछ को भारत में उच्च लागत के कारण फिजिकल मांग में अस्थायी गिरावट की उम्मीद है, लेकिन कई का मानना है कि Gold के सांस्कृतिक महत्व और बचत के रूप में इसकी भूमिका को देखते हुए लंबी अवधि की मांग मजबूत बनी रहेगी। वित्तीय Gold उत्पादों, जैसे एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ETFs) की ओर रुझान तेज होने की उम्मीद है, खासकर युवा निवेशकों के बीच जो विविधीकरण और आसान पहुंच चाहते हैं। अप्रैल 2026 में, रिकॉर्ड कीमतों के बावजूद, भारत में Gold ETFs में मजबूत निवेश देखा गया। अंतर्राष्ट्रीय बाजारों के लिए, Gold के लिए लगभग $4,500 प्रति औंस पर सपोर्ट देखा जा रहा है, जबकि $4,757 पर इसका 50-दिन का मूविंग एवरेज प्रतिरोध (Resistance) है। MCX पर, Gold के लिए सपोर्ट लगभग ₹1,54,000 के पास है, और ₹1,62,000 पर प्रतिरोध है। बाजार की आगे की दिशा भू-राजनीतिक बदलावों, केंद्रीय बैंक की नीतियों और भारतीय रुपये की स्थिरता पर निर्भर करेगी।