मंगलवार को भारतीय कमोडिटी बाज़ारों में बड़ी गिरावट आई, सोना और चांदी के फ्यूचर रेट्स (Futures Rates) गिर गए। यह गिरावट ग्लोबल बाज़ार का असर है, जहाँ अमरीकी ब्याज दरें बढ़ने और डॉलर के मज़बूत होने की उम्मीदों ने कीमती धातुओं की डिमांड (Demand) को कम कर दिया है। ऐसा लगातार चौथे महीने हुआ है।
क्या हुआ?
मंगलवार, 30 जून को भारतीय बुलियन बाज़ारों में बिकवाली का दबाव देखने को मिला। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर सोना और चांदी के फ्यूचर रेट्स (Futures Rates) नीचे आ गए। अगस्त डिलीवरी वाले सोने के फ्यूचर में 1.3% से ज़्यादा की गिरावट आई और यह प्रति 10 ग्राम ₹1.40 लाख के आसपास ट्रेड कर रहा था। वहीं, सितंबर डिलीवरी वाली चांदी के फ्यूचर में करीब 1% की कमी आई और यह प्रति किलोग्राम ₹2.20 लाख के नज़दीक बना हुआ था। घरेलू बाज़ार में यह गिरावट इंटरनेशनल मार्केट की कमज़ोरी के साथ मेल खाती है, जहाँ स्पॉट गोल्ड (Spot Gold) की कीमतें $4,000 प्रति औंस के नीचे चली गई हैं।
फेड और डॉलर क्यों ज़रूरी हैं?
कीमती धातुओं में निवेश करने वालों के लिए अमरीकी फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) की मॉनेटरी पॉलिसी (Monetary Policy) एक अहम इंडिकेटर है। सोना और चांदी पर कोई ब्याज (Interest) नहीं मिलता। जब अमरीकी सेंट्रल बैंक ब्याज दरें बढ़ाता है, तो बॉन्ड (Bonds) और अन्य इंटरेस्ट-बेयरिंग एसेट्स (Interest-bearing assets) ग्लोबल इन्वेस्टर्स के लिए ज़्यादा आकर्षक हो जाते हैं। जैसे-जैसे पैसा इन एसेट्स में जाता है, सोने की डिमांड अक्सर कम हो जाती है।
इसके अलावा, अमरीकी डॉलर और सोने के बीच एक उलटा रिश्ता (Inverse Relationship) है। चूँकि सोने की ग्लोबल प्राइसिंग डॉलर में होती है, एक मज़बूत डॉलर दूसरी करेंसी रखने वाले खरीदारों के लिए धातु को महंगा बना देता है। इससे आमतौर पर डिमांड घटती है और कीमतें नीचे आती हैं। बाज़ार पार्टिसिपेंट्स (Market Participants) के अनुसार इस साल करीब तीन बार रेट हाइक (Rate Hike) की उम्मीद है, जिसने बुलियन के लिए मुश्किल माहौल बना दिया है।
व्यापक आर्थिक दबाव
कीमतों में हालिया गिरावट किसी अकेले कारण से नहीं है। लगातार बनी हुई महंगाई (Inflation) की चिंताएं और ऊँची एनर्जी कॉस्ट (Energy Costs) मार्केट के सेंटीमेंट (Sentiment) पर भारी पड़ रही हैं। ज़्यादा महंगाई के चलते सेंट्रल बैंक अक्सर टाइट मॉनेटरी पॉलिसी बनाए रखते हैं, जिससे ब्याज दरें लंबे समय तक ऊँची रहती हैं। इसके अलावा, कच्चे तेल और एनर्जी की कीमतों में अस्थिरता (Volatility) भी महंगाई को बढ़ा रही है, जिससे कीमती धातुओं का आउटलुक (Outlook) जटिल हो गया है। इन सब वजहों से ग्लोबल गोल्ड प्राइसेस (Global Gold Prices) में लगातार चौथे महीने गिरावट आई है, जो 2008 के बाद सबसे लंबी ऐसी सीरीज है।
सेमीकंडक्टर और एनर्जी का लिंक
मार्केट एनालिस्ट्स (Market Analysts) ने यह भी बताया है कि सेमीकंडक्टर चिप्स (Semiconductor Chips) की ज़्यादा डिमांड और बढ़ती एनर्जी कॉस्ट जैसे बड़े आर्थिक बदलाव महंगाई को ऊँचाई पर बनाए हुए हैं। जब महंगाई को कंट्रोल करना मुश्किल होता है, तो नज़दीकी भविष्य में ब्याज दरें घटने की उम्मीदें धूमिल हो जाती हैं। ऐसे माहौल में सोने जैसी नॉन- यील्डिंग एसेट्स (Non-yielding assets) के लिए मुश्किलें बढ़ती हैं, क्योंकि बाज़ार को यह हकीकत स्वीकार करनी पड़ती है कि ऊँची बरोइंग कॉस्ट (Borrowing Costs) लंबे समय तक बनी रहेगी।
निवेशक आगे क्या देख सकते हैं?
बुलियन मार्केट को ट्रैक करने वालों के लिए, अगली सबसे अहम चीज़ फेडरल रिजर्व की पॉलिसी की दिशा है। इन्वेस्टर्स संभवतः भविष्य में होने वाले रेट हाइक्स (Rate Hikes) की संख्या और समय पर गाइडेंस की तलाश करेंगे। अमरीकी महंगाई और एम्प्लॉयमेंट (Employment) के आंकड़ों से जुड़ी कोई भी खबर डॉलर की मजबूती और नतीजतन, सोना-चांदी की कीमतों की दिशा को भी प्रभावित करेगी। बाज़ार पार्टिसिपेंट्स (Market Participants) ग्लोबल जियोपॉलिटिकल डेवलपमेंट (Geopolitical Developments) और एनर्जी प्राइस ट्रेंड्स (Energy Price Trends) पर भी नज़र रखना जारी रखेंगे, क्योंकि ये अक्सर सेफ-हेवन डिमांड (Safe-haven demand) में अचानक बदलाव ला सकते हैं।
