24 जून को मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर सोने और चांदी के वायदा भावों में गिरावट दर्ज की गई। अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने और अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की उम्मीदों ने कीमती धातुओं की मांग को कम कर दिया है। निवेशक अब ब्याज दरों की भविष्य की दिशा का संकेत पाने के लिए अमेरिकी महंगाई के आंकड़ों पर करीब से नजर रख रहे हैं।
क्या हुआ?
भारत के मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर बुधवार, 24 जून को सोना और चांदी के वायदा भावों में गिरावट देखी गई। सोने के वायदा भाव 1% से अधिक गिरकर 10 ग्राम के लिए ₹1.46 लाख के करीब कारोबार कर रहे थे। इसी तरह, चांदी के वायदा भावों पर भी दबाव रहा, जिनकी कीमतें ₹2.33 लाख प्रति किलोग्राम से नीचे आ गईं। यह गिरावट वैश्विक बाजारों में एक व्यापक प्रवृत्ति को दर्शाती है, जहाँ अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने के कारण कीमती धातुएँ अपना मूल्य बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही हैं।
वैश्विक कारक घरेलू कीमतों को कैसे प्रभावित करते हैं?
हालांकि ट्रेडिंग भारतीय एक्सचेंज पर होती है, लेकिन भारत में सोने की कीमत काफी हद तक वैश्विक बाजारों से प्रभावित होती है। विश्व स्तर पर सोने का मूल्य अमेरिकी डॉलर में तय होता है। जब अमेरिकी डॉलर अन्य मुद्राओं के मुकाबले मजबूत होता है, तो अन्य मुद्राओं वाले खरीदारों के लिए सोना महंगा हो जाता है, जिससे आमतौर पर मांग कम हो जाती है। इसके अलावा, सोने को अक्सर आर्थिकTrouble के समय में एक सुरक्षित निवेश माना जाता है। हालांकि, जब अन्य संपत्तियां—जैसे अमेरिकी सरकारी बॉन्ड—ब्याज दर में बदलाव के कारण उच्च रिटर्न देना शुरू कर देती हैं, तो निवेशक अक्सर सोने से पैसा निकालकर उन उच्च-उपज वाली संपत्तियों में लगा देते हैं।
ब्याज दर और डॉलर का संबंध
हालिया मूल्य गिरावट काफी हद तक अमेरिकी फेडरल रिजर्व के संकेतों से जुड़ी है। बाजारों को वर्तमान में उम्मीद है कि मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए अमेरिकी ब्याज दरें लंबी अवधि तक ऊंची बनी रह सकती हैं। जब अमेरिकी ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो अमेरिकी डॉलर आमतौर पर मजबूत होता है और बॉन्ड यील्ड (Bond Yield) बढ़ जाती है। चूंकि सोना कोई ब्याज या डिविडेंड (Dividend) उत्पन्न नहीं करता है, इसलिए उच्च ब्याज दरों पर बॉन्ड के साथ प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो जाता है। इस गतिशीलता ने बुलियन के लिए अनिश्चितता का एक दौर पैदा कर दिया है, जिससे बाजारों में वर्तमान में बिकवाली का दबाव देखा जा रहा है।
निवेशकों को आगे क्या देखना चाहिए?
निवेशक अब आने वाले आर्थिक आंकड़ों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, विशेष रूप से अमेरिका से पर्सनल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर्स (PCE) रिपोर्ट। यह रिपोर्ट मुद्रास्फीति का एक प्रमुख माप है और अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दर नीतियों पर निर्णय लेते समय इस पर बारीकी से नजर रखी जाती है। कोई भी डेटा जो यह बताता है कि मुद्रास्फीति बनी हुई है, वह आगे ब्याज दर में बढ़ोतरी की उम्मीदों को जन्म दे सकता है, जिससे सोना और चांदी की कीमतों पर दबाव जारी रह सकता है। इसके विपरीत, मुद्रास्फीति में नरमी के संकेत बाजार की उम्मीदों को बदल सकते हैं। घरेलू बाजार की निगरानी करने वालों के लिए, USD-INR विनिमय दर (Exchange Rate) पर भी नजर रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि मुद्रा में उतार-चढ़ाव भारत में सोने के आयात की लागत को सीधे प्रभावित करता है।
