कीमतों पर भू-राजनीति और डॉलर का असर
सोमवार, 6 अप्रैल, 2026 को मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर सोने का फ्यूचर 0.01% गिरकर ₹1.49 लाख प्रति 10 ग्राम रहा, वहीं चांदी का फ्यूचर 0.29% घटकर ₹2.31 लाख प्रति किलोग्राम पर आ गया। इस गिरावट की मुख्य वजह वेस्ट एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिकी डॉलर का मजबूत होना है। अमेरिकी राष्ट्रपति की ईरान को लेकर चेतावनी ने क्षेत्रीय संघर्ष की चिंताओं को बढ़ाया है, जिससे डॉलर को सुरक्षित निवेश (Safe Haven) माना जा रहा है और सोने-चांदी जैसी एसेट्स पर दबाव आ रहा है।
स्पॉट गोल्ड (Spot Gold) की कीमत 0.5% गिरकर $4,652.89 प्रति औंस और स्पॉट सिल्वर (Spot Silver) 0.9% घटकर $72.34 प्रति औंस पर पहुंच गई। शुक्रवार को आए उम्मीद से बेहतर अमेरिकी रोजगार के आंकड़ों ने भी कीमती धातुओं पर दबाव बनाया। 1.78 लाख से ज्यादा नॉन-फार्म जॉब्स (Nonfarm Jobs) के जुड़ने और बेरोजगारी दर के 4.3% पर आने के बाद, अब बाजार यह उम्मीद कर रहा है कि फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) इस साल ब्याज दरों में कटौती नहीं करेगा, जो सोने-चांदी के लिए निगेटिव है। वहीं, ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude Oil) $111 प्रति बैरल के ऊपर बना रहा, जो $109.20 पर था, 0.15% की बढ़ोतरी के साथ। तेल की बढ़ती कीमतें भी महंगाई की चिंताएं बढ़ा रही हैं, जिसका असर ब्याज दरों और सोने-चांदी की मांग पर पड़ रहा है।
एक्सपर्ट्स की नजर में क्या है आगे?
रिद्धिसिद्धि बुलियंस के मैनेजिंग डायरेक्टर और इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन के प्रेसिडेंट, पृथ्वीराज कोठारी, के मुताबिक, मौजूदा कीमतें एक बड़े अपट्रेंड (Uptrend) में 'टैक्टिकल करेक्शन' (Tactical Correction) हैं। उन्होंने कहा कि एक बड़ी तेजी के बाद, सोने-चांदी में प्रॉफिट-बुकिंग (Profit-Taking) हो रही है, और इसमें अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने का भी योगदान है। कोठारी का मानना है कि यह 'कंसोलिडेशन फेज' (Consolidation Phase) है, जो मंदी का संकेत नहीं, बल्कि खरीदने के अच्छे अवसर दे रहा है।
2026 के लिए कई ब्रोकरेज फर्म्स का भी यही मानना है। जे.पी. मॉर्गन (J.P. Morgan) जैसी संस्थाएं सोने का साल के अंत तक $6,300 प्रति औंस रहने का अनुमान लगा रही हैं, जिसका मुख्य कारण सेंट्रल बैंक्स (Central Banks) की लगातार खरीदारी है। बैंक ऑफ अमेरिका (Bank of America) और वेल्स फारगो (Wells Fargo) ने $6,000-$6,300 का टारगेट दिया है, जबकि गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) का लक्ष्य $5,400 है। ये सभी इसे कंसोलिडेशन फेज ही मान रहे हैं। अप्रैल 2026 तक SPDR Gold Shares ETF का मार्केट कैप $165 बिलियन से ऊपर था।
चांदी का लॉन्ग-टर्म आउटलुक भी मजबूत दिख रहा है, जिसकी वजह सप्लाई की कमी और AI व ग्रीन एनर्जी जैसे सेक्टरों से बढ़ती इंडस्ट्रियल डिमांड (Industrial Demand) है। जे.पी. मॉर्गन 2026 के लिए चांदी का औसतन $81 प्रति औंस रहने का अनुमान लगा रहा है, जबकि UBS $85 और बैंक ऑफ अमेरिका $135-$309 का अनुमान दे रहे हैं। अप्रैल 2026 तक iShares Silver Trust ETF में करीब $35.65 बिलियन का निवेश था।
जोखिम और आगे का रास्ता
लॉन्ग-टर्म में भले ही आउटलुक पॉजिटिव हो, लेकिन कुछ तात्कालिक जोखिम भी हैं। वेस्ट एशिया में टेंशन बढ़ने से सप्लाई चेन (Supply Chain) और महंगाई पर असर पड़ सकता है, जिससे सेंट्रल बैंक्स को ब्याज दरों को लेकर सख्त फैसले लेने पड़ सकते हैं। अमेरिकी डॉलर में मजबूती जारी रह सकती है। वहीं, किसी बड़ी ग्लोबल मंदी से चांदी की इंडस्ट्रियल डिमांड कम हो सकती है। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि जियोपॉलिटिकल इवेंट्स और सेंट्रल बैंक्स के फैसलों से शॉर्ट-टर्म में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। लेकिन, सेंट्रल बैंक्स की खरीदारी, महंगाई की चिंताएं और चांदी की मजबूत इंडस्ट्रियल डिमांड जैसी वजहें कीमतों को सहारा दे रही हैं। मौजूदा गिरावट को एक बड़े बुल मार्केट (Bull Market) में हेल्दी कंसोलिडेशन माना जा रहा है, जो स्मार्ट निवेशकों के लिए एंट्री का अच्छा मौका हो सकता है।