ग्लोबल मार्केट से मिले संकेतों और फेडरल रिजर्व की संभावित सख्त पॉलिसी की आशंका के चलते सोने और चांदी की कीमतों में भारी गिरावट देखी गई है। हाल ही में रिकॉर्ड ऊंचाई छूने के बाद, इन कीमती धातुओं ने अचानक यू-टर्न लिया है।
ऐतिहासिक गिरावट: रिकॉर्ड हाई से औंधे मुंह गिरे दाम
जनवरी 2026 के अंत में जहाँ सोना $5,600 प्रति औंस के करीब कारोबार कर रहा था, वहीं कुछ ही दिनों में यह गिरकर लगभग $4,400 प्रति औंस पर आ गया। यह 12% से ज्यादा की एक दिन की गिरावट थी, जो 1980 के दशक के बाद सबसे बड़ी दैनिक गिरावट में से एक है। चांदी का हाल और भी बुरा रहा, जिसने अपने शिखर $121 प्रति औंस से 35% से अधिक की गिरावट दर्ज की और तीन दिनों में 41% से ज्यादा गिरकर लगभग $71 प्रति औंस पर आ गई।
भारत में, मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर 5 फरवरी 2026 को गोल्ड फ्यूचर्स लगभग ₹1,48,455 के निचले स्तर पर पहुँच गया, जो पिछले लक्ष्यों से काफी नीचे है। इसी दिन सिल्वर फ्यूचर्स ने भी इंट्राडे में ₹2,39,000 के आसपास के निचले स्तर को छुआ।
इस भारी बिकवाली (sell-off) का मुख्य कारण फेडरल रिजर्व के चेयरमैन के तौर पर केविन वॉर्श (Kevin Warsh) के नामांकन को माना जा रहा है, जिनकी सोच को हॉकिश (सख्त मौद्रिक नीति अपनाने वाली) समझा जाता है। इस नामांकन ने अमेरिकी डॉलर को मजबूत किया, जिससे सोने-चांदी जैसी नॉन-यील्डिंग एसेट्स (बिना ब्याज वाली संपत्तियां) निवेशकों के लिए कम आकर्षक हो गईं। फ्यूचर्स एक्सचेंजों पर मार्जिन की बढ़ी हुई आवश्यकता ने भी मजबूरन बिकवाली (forced liquidations) के चलते इस गिरावट को और तेज कर दिया।
फंडामेंटल बनाम मैक्रो हेडविंड्स: क्या कह रहे हैं आंकड़े?
हालांकि, हालिया गिरावट ने बाजार की भावनाओं (market sentiment) में एक बड़ा बदलाव दिखाया है, लेकिन सोने और चांदी के शुरुआती तेजी के पीछे के मूल कारण अब भी मौजूद हैं। सोने की सुरक्षित-संपत्ति (safe-haven) के तौर पर भूमिका और महंगाई (inflation) से बचाव की क्षमता, साथ ही सेंट्रल बैंकों द्वारा लगातार की जा रही खरीदारी, इसके लिए मज़बूत आधार बने हुए हैं। सेंट्रल बैंक भू-राजनीतिक अनिश्चितता और मुद्रा के अवमूल्यन (currency debasement) के खिलाफ बचाव के लिए रणनीतिक रूप से सोने में निवेश बढ़ा रहे हैं।
वहीं, चांदी की बात करें तो सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन (EVs) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे क्षेत्रों से बढ़ती औद्योगिक मांग ने इसे सहारा दिया था। लेकिन, कुछ विश्लेषकों का कहना है कि चांदी की कीमत में हालिया उतार-चढ़ाव पर स्पेकुलेटिव पोजिशनिंग (सट्टेबाजी) का प्रभुत्व रहा है, और औद्योगिक मांग में संभावित कमजोरी ने सावधानी बढ़ा दी है। इसके अलावा, फेडरल रिजर्व की संभावित सख्त मौद्रिक नीति के कारण अमेरिकी डॉलर का मजबूत होना, डॉलर-डोमिनेटेड कमोडिटीज को अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के लिए महंगा बना रहा है।
अनिश्चित भविष्य: विश्लेषकों की राय और आगे की राह
दिसंबर 2025 में यूएस महंगाई दर (US inflation) थोड़ी घटकर 2.7% पर आई थी, लेकिन फेडरल रिजर्व के लिए यह अभी भी एक बड़ा फोकस बनी हुई है। उम्मीद है कि फेड इंटरेस्ट रेट कट (ब्याज दर में कटौती) को लेकर जल्दबाजी न करे, जो डॉलर को और मजबूत रख सकता है। वर्तमान में ब्याज दर 3.5-3.75% के दायरे में है, और 2026 में दर कटौती की संभावनाओं पर बाजार की नज़र रहेगी।
इस तेज गिरावट ने विश्लेषकों के बीच दो अलग-अलग राय पैदा कर दी है। कुछ का मानना है कि यह सट्टा का बुलबुला (speculative bubble) फूटने के बाद एक ज़रूरी 'रियलिटी चेक' था, जो लंबी अवधि के रणनीतिक निवेशकों के लिए सोने जैसे कीमती धातुओं में निवेश के नए अवसर पैदा कर सकता है, खासकर जब सेंट्रल बैंकों की मांग और वैश्विक अस्थिरता जैसे कारक मौजूद हों।
हालांकि, तत्काल भविष्य में अत्यधिक अस्थिरता (volatility) देखने को मिल सकती है। मजबूत होता डॉलर और फेडरल रिजर्व का हॉकिश रुख, सोने-चांदी के लिए अल्पकालिक (short-term) रूप से मंदी का संकेत (bearish outlook) दे रहा है। सोने के लिए लंबी अवधि का मामला इसकी विविधीकरण भूमिका (diversification role) और वैश्विक अस्थिरता से मज़बूत होता है, लेकिन आगे का रास्ता उतार-चढ़ाव भरा रहने की संभावना है। चांदी, अपनी उच्च अस्थिरता और औद्योगिक व सट्टा मांग पर निर्भरता के कारण, एक और अधिक अनिश्चित राह का सामना कर रही है, जहां कुछ विश्लेषक इसके फंडामेंटल से जुड़े न होने के कारण सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं। अब बाजार फेडरल रिजर्व की अगली नीतियों और भू-राजनीतिक तनावों में किसी भी बदलाव पर बारीकी से नज़र रखेगा ताकि इन कीमती धातुओं की अगली दिशा तय हो सके।
