सोमवार, 9 मार्च को कीमती धातुओं (precious metals) में गिरावट देखने को मिली। मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के कारण अक्सर सोने और चांदी को 'सेफ हेवन' (safe-haven) डिमांड मिलती है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। मैक्रो इकोनॉमिक दबावों का असर ज्यादा दिखा। MCX पर अप्रैल डिलीवरी वाले सोने के फ्यूचर्स (futures) लगभग ₹1.60 लाख प्रति 10 ग्राम के आसपास मंडरा रहे थे, जबकि स्पॉट गोल्ड (spot gold) $5,082 प्रति औंस के करीब गिर गया, जो 1.7% से ज्यादा की गिरावट थी। इसी तरह, मई डिलीवरी वाले चांदी के फ्यूचर्स ₹2.63 लाख प्रति किलोग्राम के पास ट्रेड कर रहे थे, और स्पॉट चांदी (spot silver) $80.99 प्रति औंस पर आ गई, जो करीब 4% गिरी। यह चाल आम 'रिस्क-ऑफ' (risk-off) बिहेवियर से अलग थी।
एक बड़ा फैक्टर डॉलर इंडेक्स (Dollar Index) का मजबूत होना रहा, जिसने डॉलर-डिनॉमिनेटेड (dollar-denominated) कीमती धातुओं को अंतर्राष्ट्रीय खरीदारों के लिए महंगा बना दिया। इसके साथ ही, फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) की मॉनेटरी पॉलिसी (monetary policy) को लेकर उम्मीदें भी बदलीं। अमेरिका के सीपीआई (CPI) डेटा के 2.5% सालाना रहने के अनुमान ने तुरंत ब्याज दरों में कटौती के संकेत नहीं दिए। बल्कि, हॉरमुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में सप्लाई बाधित होने की आशंकाओं के चलते कच्चे तेल की कीमतें $110 प्रति बैरल के पार पहुंचने से महंगाई की चिंताएं बढ़ गईं। इससे मार्केट्स ने मॉनेटरी ईजिंग (monetary easing) की उम्मीदें कम कर दीं। ऐसे में, ऊंची ब्याज दरों का माहौल सोने और चांदी जैसी नॉन-यील्डिंग एसेट्स (non-yielding assets) के लिए 'ऑपरच्युनिटी कॉस्ट' (opportunity cost) बढ़ाता है, जिससे इनकी अपील कम हो जाती है, भले ही भू-राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई हो।
सोने के मुकाबले चांदी पर ऊर्जा लागत बढ़ने से ग्लोबल ग्रोथ और इंडस्ट्रियल डिमांड (industrial demand) धीमी पड़ने की चिंता का अतिरिक्त दबाव रहा। हालांकि, सोलर (solar), इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (electric vehicles) और AI इन्फ्रास्ट्रक्चर (AI infrastructure) जैसे सेक्टर्स में चांदी की अहम भूमिका के कारण इसे कुछ सपोर्ट मिल रहा है। 2026 में लगातार छठे साल मार्केट डेफिसिट (market deficit) रहने का अनुमान और इसकी इंडस्ट्रियल यूसेज (industrial usage) चांदी को एक स्ट्रक्चरली सपोर्टेड आउटलुक (structurally supported outlook) दे रही है, भले ही शॉर्ट-टर्म में वोलेटिलिटी (volatility) हो।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बावजूद, निकट भविष्य के लिए एक सतर्क आउटलुक (cautious outlook) दिख रहा है। डॉलर की लगातार मजबूती, बुलियन (bullion) की लागत बढ़ा रही है। साथ ही, ऊंचे तेल की कीमतों से पैदा हुई महंगाई की लगातार चिंताएं फेडरल रिजर्व को उम्मीद से ज्यादा समय तक 'हॉकिश' (hawkish) बने रहने पर मजबूर कर सकती हैं। हाल की तेजी के बाद प्रॉफिट-टेकिंग (profit-taking) का जोखिम भी है, जैसा कि MCX पर सोने के फ्यूचर्स में देखा गया। चांदी की इंडस्ट्रियल डिमांड सीधे तौर पर इकोनॉमिक ग्रोथ से जुड़ी है, इसलिए यह हाई एनर्जी प्राइस (high energy prices) या टाइट मॉनेटरी कंडीशन (tight monetary conditions) से धीमा हो सकती है। हालांकि, 9 मार्च, 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, सोना पिछले साल 76.71% और चांदी 161.56% बढ़ चुकी है, पर फिलहाल कीमतें कई विरोधाभासी शक्तियों के बीच फंस गई हैं। भारत में ऊंचे इन्वेंटरी (inventories) और शिपिंग लागत (shipping costs) ने घरेलू सोने की मांग को भी प्रभावित किया है।
इन तात्कालिक दबावों के नीचे, कीमती धातुओं के लिए मीडियम-टर्म (medium-term) का आउटलुक अभी भी सकारात्मक (constructive) बना हुआ है। जानकारों का मानना है कि सोना और चांदी स्ट्रक्चरली मजबूत अपट्रेंड (structurally strong uptrend) में हैं। सोने के लिए $5,000 प्रति औंस और चांदी के लिए $80 प्रति औंस के आसपास प्रमुख टेक्निकल सपोर्ट लेवल्स (technical support levels) देखे जा रहे हैं। सेंट्रल बैंक्स (Central Banks) और इन्वेस्टर्स (investors) से लगातार मांग आने की उम्मीद है। 2026 में सोने की औसत कीमत $5,000/औंस रहने का अनुमान है, जिसमें और बढ़ोतरी की भी गुंजाइश है। चांदी 2026 में औसतन $81/औंस रह सकती है, जो इसके लगातार सप्लाई डेफिसिट (supply deficit) और बढ़ती इंडस्ट्रियल एप्लीकेशन्स (industrial applications) से प्रेरित होगी। यह स्ट्रक्चरल डिमांड, भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के साथ मिलकर, एक मजबूत सपोर्ट प्रदान करती है, जिससे मौजूदा गिरावट को ट्रेंड रिवर्सल (trend reversal) की बजाय कंसॉलिडेशन (consolidation) माना जा रहा है।
