अमेरिकी फेडरल रिजर्व के चेयरमैन केविन वॉर्श के ब्याज दरों में बढ़ोतरी रोकने के संकेत देने के बाद सोने की कीमतों में तेजी आई है। सोना बढ़कर **$4,052.03** प्रति औंस पर पहुंच गया। हालांकि, अमेरिकी डॉलर की मजबूती सोने की चाल पर लगाम लगा सकती है। अब सवाल है कि इन ग्लोबल ट्रेंड्स का भारतीय MCX गोल्ड प्राइस और गोल्ड से जुड़े इन्वेस्टमेंट प्रोडक्ट्स पर क्या असर होगा।
क्या हुआ?
अमेरिकी फेडरल रिजर्व के चेयरमैन केविन वॉर्श के बयानों के बाद सोने की कीमतों में बढ़त जारी है और यह $4,052.03 प्रति औंस के स्तर पर पहुंच गया है। पुर्तगाल में यूरोपियन सेंट्रल बैंक फोरम में वॉर्श ने संकेत दिया कि ब्याज दरों में बढ़ोतरी को रोका जा सकता है। यह बयान मॉनेटरी पॉलिसी को लेकर एक कम आक्रामक रुख का इशारा करता है, जिससे सोने को सहारा मिला है। आपको बता दें कि ऊंची ब्याज दरों के चलते सोने पर दबाव था। वॉर्श ने महंगाई को 2% के लक्ष्य तक लाने और कीमतों में स्थिरता बनाए रखने की प्रतिबद्धता पर जोर दिया, जिससे फ्यूचर की मॉनेटरी टाइटनिंग को लेकर मार्केट की चिंताओं को कम करने में मदद मिली।
सोने में क्यों आई तेजी?
सोना एक नॉन-यील्डिंग एसेट (non-yielding asset) माना जाता है, यानी इससे कोई इंटरेस्ट या डिविडेंड नहीं मिलता। जब फेडरल रिजर्व जैसी सेंट्रल बैंक ब्याज दरें बढ़ाती हैं, तो ट्रेजरी बॉन्ड और अमेरिकी डॉलर जैसे एसेट्स ज्यादा आकर्षक हो जाते हैं क्योंकि वे ज्यादा रिटर्न देते हैं। ऐसे में निवेशक अक्सर सोने से पैसा निकालकर इन हाई-यील्डिंग एसेट्स में लगाते हैं। इसके विपरीत, जब ब्याज दरों का आउटलुक स्थिर होता है या पॉज (pause) का संकेत मिलता है, तो सोना एक सेफ-हेवन एसेट (safe-haven asset) के तौर पर ज्यादा लुभावना हो जाता है। फेड चेयरमैन की हालिया टिप्पणियों से रेट हाइक के तेजी से बढ़ने का डर कम हुआ, जिससे अमेरिकी डॉलर में मजबूती के बावजूद सोने की कीमतों को रिकवर करने में मदद मिली।
अमेरिकी इकोनॉमिक डेटा का नज़रिया
हालांकि, रेट पॉज की संभावना ने सोने का सपोर्ट किया है, लेकिन ओवरऑल इकोनॉमिक पिक्चर मिली-जुली बनी हुई है। जून के लिए अमेरिका के मैन्युफैक्चरिंग डेटा में लगातार ग्रोथ दिखी है, पर ग्रोथ की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ती नजर आ रही है। वहीं, लेबर मार्केट मजबूत बना हुआ है, जहां प्राइवेट सेक्टर ने पिछले एक साल में सबसे मजबूत तीन महीने की हायरिंग दर्ज की है। यह मिक्स्ड डेटा एक अनिश्चितता पैदा करता है, क्योंकि फेडरल रिजर्व को महंगाई को कंट्रोल करने की जरूरत और इकोनॉमी को धीमा करने के रिस्क के बीच संतुलन बनाना होगा। अमेरिकी डॉलर की मजबूती और ट्रेजरी यील्ड्स में रिकवरी भी हेडविंड्स (headwinds) का काम कर रही है, यानी सोने की बढ़त को इन ट्रेडिशनल सेफ-हेवन एसेट्स से मुकाबला करना पड़ सकता है।
भारतीय निवेशकों पर असर
भारतीय निवेशक अक्सर MCX एक्सचेंज के जरिए ग्लोबल गोल्ड प्राइस की मूवमेंट से प्रभावित होते हैं। चूंकि भारत अपनी सोने की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा इंपोर्ट करता है, इसलिए डोमेस्टिक प्राइस पर इंटरनेशनल स्पॉट प्राइस और USD-INR एक्सचेंज रेट दोनों का असर पड़ता है। जब ग्लोबल गोल्ड प्राइसेज बढ़ते हैं, तो आमतौर पर भारत में फिजिकल गोल्ड और गोल्ड से जुड़े इन्वेस्टमेंट प्रोडक्ट्स जैसे सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड्स (SGBs) और गोल्ड ईटीएफ (Gold ETFs) की कीमतें भी बढ़ जाती हैं। हालांकि, अगर अमेरिकी डॉलर रुपये के मुकाबले मजबूत रहता है, तो भारत में कीमतों में बढ़ोतरी करेंसी की चाल के आधार पर कम या ज्यादा हो सकती है।
आगे क्या देखें?
मार्केट के लिए सबसे अहम अपडेट आने वाला US पेरोल डेटा होगा। यह रिपोर्ट लेबर मार्केट की हेल्थ और मौजूदा हायरिंग ट्रेंड को सस्टेन करने की क्षमता पर ज्यादा स्पष्टता देगा। अगर डेटा में लगातार मजबूती दिखती है, तो फेडरल रिजर्व को अपनी इंटरेस्ट रेट की पोजीशन पर फिर से विचार करना पड़ सकता है। निवेशक फेडरल रिजर्व के अधिकारियों से और भी कमेंट्री की तलाश करेंगे ताकि यह अंदाजा लगाया जा सके कि चेयरमैन वॉर्श द्वारा संकेतित रेट पॉज एक अस्थायी बदलाव है या रणनीति में एक लंबा बदलाव।
