वेस्ट एशिया में जारी जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता के कारण गोल्ड की कीमतों में रिकवरी देखी गई है और यह **$4,143.87** प्रति औंस के स्तर पर पहुंच गया है। निवेशक अब सुरक्षित निवेश (Safe-haven) की मांग और अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की संभावनाओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
मंगलवार को सोने की कीमतों में एक बार फिर तेजी देखने को मिली है। हाल ही में सात सप्ताह के निचले स्तर पर आने के बाद सोना 0.7% चढ़कर $4,143.87 प्रति औंस के भाव पर कारोबार कर रहा है। इस तेजी के पीछे वेस्ट एशिया में बढ़ता तनाव मुख्य कारण है, जो निवेशकों को एक बार फिर गोल्ड जैसे सेफ-हेवन एसेट्स की ओर खींच रहा है। हालांकि, सोने की राह में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।
फेड रेट का असर और चुनौतियां
CME FedWatch डेटा के अनुसार, अक्टूबर में अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना बढ़कर 70.3% हो गई है, जबकि एक हफ्ते पहले यह 57.6% थी। चूंकि गोल्ड पर कोई ब्याज नहीं मिलता, इसलिए ऊंची ब्याज दरों के माहौल में निवेशकों का रुझान सरकारी बॉन्ड्स जैसे इंटरेस्ट-बेयरिंग एसेट्स की तरफ ज्यादा रहता है, जो सोने के लिए एक बड़ी चुनौती है।
भारतीय निवेशकों के लिए क्या हैं संकेत?
ग्लोबल मार्केट में हो रही ये हलचल सीधे तौर पर भारतीय बुलियन मार्केट, गोल्ड ETFs और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड्स (SGB) को प्रभावित करती है। भारत में सोने की कीमतें अंतरराष्ट्रीय ट्रेंड और USD-INR एक्सचेंज रेट पर काफी हद तक निर्भर करती हैं। अगर रुपया मजबूत होता है, तो ग्लोबल तेजी का असर घरेलू बाजार में कम हो सकता है, लेकिन रुपये की कमजोरी इस तेजी को और हवा दे सकती है।
आने वाले दिनों में अमेरिकी इकोनॉमी से जुड़े अहम डेटा, जैसे कि कंज्यूमर कॉन्फिडेंस और नॉन-फार्म पेरोल्स रिपोर्ट, मार्केट की दिशा तय करेंगे। अगर महंगाई का दबाव बना रहता है, तो फेड को दरों को लंबे समय तक ऊंचा रखना पड़ सकता है। गोल्ड के अलावा सिल्वर, प्लैटिनम और पैलेडियम जैसे अन्य कीमती धातुओं में फिलहाल मिले-जुले संकेत हैं।
