सोने में आई रिकॉर्डतोड़ तेजी: वजहें क्या हैं?
भारतीय सर्राफा बाजार में 9 फरवरी 2026 को सोने की चाल ने निवेशकों को चौंका दिया। 24 कैरेट सोने के दाम ₹157,450 प्रति 10 ग्राम के स्तर पर पहुंच गए, जो पिछले दिन के मुकाबले ₹2,450 की बढ़त है। सभी शुद्धताओं वाले सोने में करीब 1.58% की तेजी देखी गई। इस जोरदार उछाल का सबसे बड़ा कारण अमेरिकी डॉलर का कमजोर होना है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर-डिनॉमिनेटेड कमोडिटीज (Dollar-denominated commodities) निवेशकों के लिए ज्यादा आकर्षक हो गई हैं।
इस तेजी को चीन के सेंट्रल बैंक की तरफ से लगातार हो रही सोने की खरीदारी ने और हवा दी है। माना जा रहा है कि चीन डी-डॉलराइजेशन (De-dollarization) की अपनी रणनीति के तहत फॉरेन रिजर्व (Foreign reserves) में सोने की हिस्सेदारी बढ़ा रहा है। इसके अलावा, मिडिल ईस्ट में बढ़ती जियोपॉलिटिकल टेंशन, खासकर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव, सोने को एक सेफ-हेवन एसेट (Safe-haven asset) के तौर पर मजबूती दे रहा है। जापान में नई सरकार के गठन के बाद संभावित एक्सपेंशनरी फिस्कल पॉलिसी (Expansionary fiscal policy) को लेकर बनी अनिश्चितता ने भी प्रीशियस मेटल्स (Precious metals) को सपोर्ट किया है। इन ग्लोबल फैक्टर्स की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना $5,000 प्रति औंस के ऊपर चला गया है।
भारत में क्यों महंगा है सोना? दुबई से तुलना
हालांकि, ग्लोबल तेजी के बावजूद भारतीय घरेलू सोने की कीमतों और अंतरराष्ट्रीय भावों के बीच एक बड़ा अंतर बना हुआ है। 9 फरवरी 2026 को भारत में 24 कैरेट सोना दुबई के मुकाबले लगभग ₹8,685 यानी 5.84% महंगा बिक रहा था। यह प्रीमियम स्थानीय ड्यूटी और टैक्स से पहले का है। भारत में इंपोर्ट ड्यूटी (Import duty) की बात करें तो 2026 के यूनियन बजट में इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया था। फिलहाल, इंपोर्ट ड्यूटी 6% है, जिसमें 5% बेसिक कस्टम ड्यूटी (Basic customs duty) और 1% एग्रीकल्चर इन्फ्रास्ट्रक्चर और डेवलपमेंट सेस (Agriculture Infrastructure and Development Cess) शामिल है। इस ड्यूटी स्ट्रक्चर की वजह से खरीदारों को भले ही एक निश्चितता मिली हो, लेकिन घरेलू कीमतें ऊंची बनी हुई हैं, जिसका असर कंज्यूमर डिमांड (Consumer demand) पर पड़ सकता है।
चांदी और प्लैटिनम का हाल, बाजार में वोलेटिलिटी
सिर्फ सोना ही नहीं, बल्कि चांदी (Silver) और प्लैटिनम (Platinum) जैसी कीमती धातुओं में भी भारी उठापटक देखने को मिली है। जनवरी 2026 के आखिर में चांदी में एक बड़ी गिरावट आई थी, जबकि इससे पहले इसने $120 प्रति औंस का ऑल-टाइम हाई (All-time high) छुआ था। फिलहाल चांदी $80 से $90 के दायरे में ट्रेड कर रही है। वहीं, प्लैटिनम $2,108.70 प्रति ट्रॉय औंस पर कारोबार कर रहा था, जो मासिक गिरावट दिखाता है लेकिन साल-दर-साल (Year-on-year) इसमें अच्छी बढ़त है।
बाजार के जानकारों का मानना है कि डेरिवेटिव्स मार्केट (Derivatives market) में मार्जिन रिक्वायरमेंट्स (Margin requirements) का बढ़ना, फोर्सड डी-लिवरेजिंग (Forced deleveraging) और स्पेकुलेटिव पोजिशनिंग (Speculative positioning) जैसे फैक्टर शॉर्ट-टर्म में कीमतों में बड़ी गिरावट ला सकते हैं। ऐसे उतार-चढ़ाव भरे दौर में पेपर मार्केट (Paper market) और फिजिकल मार्केट (Physical market) के बीच का अंतर साफ दिखता है, जहां फ्यूचर्स (Futures) में बिकवाली होती है तो वहीं फिजिकल डिमांड हेजिंग (Hedging) और रिजर्व मैनेजमेंट (Reserve management) के लिए मजबूत बनी रहती है।
आगे क्या हो सकता है? जोखिम और उम्मीदें
फिलहाल सोने के भावों को ग्लोबल फैक्टर से सपोर्ट मिल रहा है, लेकिन कुछ जोखिम भी मौजूद हैं। जियोपॉलिटिकल इवेंट्स (Geopolitical events) और डॉलर की कमजोरी पर बहुत ज्यादा निर्भरता कीमतों के लिए एक अस्थिर आधार बना सकती है। भारतीय ग्राहकों को अंतरराष्ट्रीय भावों से काफी ज्यादा प्रीमियम देना पड़ रहा है, जो घरेलू कीमतों में और बढ़ोतरी की गुंजाइश को सीमित कर सकता है और अगर कीमतें ऐसे ही ऊंची रहीं तो मांग कम हो सकती है। इसके अलावा, जैसा कि हाल की गिरावटों से देखा गया, स्पेकुलेटिव ट्रेडिंग (Speculative trading) और मार्जिन एडजस्टमेंट्स (Margin adjustments) के प्रति बाजार की संवेदनशीलता कीमतों में तेजी से बदलाव ला सकती है।
अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) की मॉनेटरी पॉलिसी (Monetary Policy) भी एक बड़ा फैक्टर बनी हुई है। जनवरी 2026 में दरों को स्थिर रखा गया था, लेकिन आगे की राह पूरी तरह से इकोनॉमिक डेटा (Economic data) पर निर्भर करेगी। 2026 में दरों में कटौती की उम्मीदें बनी हुई हैं, लेकिन इनकी टाइमिंग और मात्रा अभी भी अनिश्चित है, जो निवेशकों के रिस्क एपेटाइट (Risk appetite) और सोने जैसी नॉन-यील्डिंग एसेट्स (Non-yielding assets) को रखने की अपॉर्च्युनिटी कॉस्ट (Opportunity cost) को प्रभावित करेगी। आने वाले अमेरिकी इकोनॉमिक इंडिकेटर्स (US economic indicators), जैसे जॉब्स (Jobs) और इन्फ्लेशन (Inflation) डेटा, इन उम्मीदों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
विश्लेषकों का क्या कहना है?
विश्लेषकों के अनुमानों में भिन्नता है। कुछ का मानना है कि सोने में तेजी जारी रहेगी, और 2026 की पहली तिमाही के अंत तक यह $5,021.67 और अगले 12 महीनों में $5,346.67 तक पहुंच सकता है। वेल्स फार्गो इन्वेस्टमेंट इंस्टीट्यूट (Wells Fargo Investment Institute) ने तो साल के अंत 2026 के लिए अपना टारगेट $6,100-$6,300 प्रति औंस तक बढ़ा दिया है। हालांकि, फरवरी 2026 को एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है, जहां से या तो तेजी जारी रह सकती है या फिर पॉलिसी बदलावों और जियोपॉलिटिकल घटनाओं के चलते बड़ी गिरावट आ सकती है। निवेशकों को सेंट्रल बैंक के फैसलों, ग्लोबल इकोनॉमिक डेटा के साथ-साथ घरेलू कीमतों और इंपोर्ट ड्यूटी पर बारीकी से नजर रखने की सलाह दी जाती है।