क्यों थम रहा है सोने का रफ्तार?
सोने की कीमतों में फिलहाल एक वोलेटाइल कंसॉलिडेशन फेज (अस्थिरता के साथ ठहराव) देखा जा रहा है। हाल ही में यूएस और ईरान के बीच सीज़फायर (ceasefire) की खबरों से भू-राजनीतिक तनाव कम होने की उम्मीद जगी, जिससे सोने की सेफ-हेवन डिमांड (सुरक्षित निवेश की मांग) पर असर पड़ा। हालांकि, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में नाकेबंदी और शांति वार्ता टूटने जैसी चिंताएं अभी भी बनी हुई हैं, जो सोने को एक मूल्यवान संपत्ति (store-of-value) बनाए रखती हैं। 13 अप्रैल को सोना 10 ग्राम के भाव ₹1,51,500 तक गिर गया था, लेकिन बाद में यह ₹1,51,983 पर बंद हुआ। इसी के साथ, चांदी की कीमतों में भी 1.14% की गिरावट आई और यह 1 किलोग्राम के ₹2,40,499 पर आ गई। शुरुआत में डॉलर के कमजोर पड़ने से सोने-चांदी को कुछ फायदा मिला था, लेकिन डॉलर के फिर मजबूत होने से यह बढ़त सीमित हो गई। विश्लेषकों का मानना है कि डॉलर की यह मजबूती सोने की कीमतों में और तेजी को रोक सकती है।
महंगाई और मजबूत डॉलर बन रहे हैं बड़ी बाधा
ऊंची तेल कीमतों के चलते महंगाई (Inflation) बढ़ने की आशंका और मजबूत डॉलर (Strong Dollar) सोने-चांदी की राह में बड़ी रुकावट पैदा कर रहे हैं। VT Markets के ग्लोबल स्ट्रेटेजी ऑपरेशंस लीड, रॉस मैक्सवेल के अनुसार, ये फैक्टर्स बाजार को एक 'वोलेटाइल कंसॉलिडेशन फेज' की ओर ले जा रहे हैं, न कि लगातार तेजी की ओर। मार्च 2026 में अमेरिका में सालाना महंगाई दर बढ़कर 3.3% तक पहुंच गई, जिसका मुख्य कारण ऊर्जा लागतों में 12.5% की बढ़ोतरी है, जो ईरान संघर्ष से भी जुड़ी है। क्रूड ऑयल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार जाने से यह उम्मीद बढ़ी है कि यूएस फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) ब्याज दरें बढ़ाने जैसे सख्त कदम उठा सकता है, जो डॉलर को और मजबूत करेगा। 13 अप्रैल को भारतीय रुपया भी कमजोर हुआ, जो पिछले 2 हफ्तों में सबसे बड़ी गिरावट थी। डॉलर के मुकाबले यह 0.7% गिरकर 93.3750 पर बंद हुआ।
सेंट्रल बैंकों की खरीद और रिटेल मांग दे रही सहारा
इन सब चुनौतियों के बावजूद, सोने में एक सुरक्षित संपत्ति (secure asset) के तौर पर भरोसा कायम है। Augmont की रिसर्च हेड, रेनिशा चिनई का कहना है कि सेंट्रल बैंकों की लगातार खरीद, गोल्ड ETF में पॉजिटिव इनफ्लो और अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) से पहले रिटेल डिमांड सोने के भाव को सहारा दे रही है। दुनिया भर के सेंट्रल बैंक बड़े खरीदार बने हुए हैं, जिन्होंने 2025 में करीब 850 टन सोना खरीदा। यह खरीदारी डॉलर से इतर निवेश, प्रतिबंधों की चिंता और महंगाई से बचाव के लिए की जा रही है। मार्च में गोल्ड ETF में ₹2,266 करोड़ का इनफ्लो हुआ, जबकि 2026 की पहली तिमाही (Q1) में कुल ₹31,561 करोड़ का निवेश आया, जो निवेशकों की लगातार दिलचस्पी दिखा रहा है। ऐतिहासिक रूप से, सोना हमेशा से वैल्यू स्टोर (value store) रहा है, खासकर तब जब फाइनेंशियल मार्केट में भरोसा कम हो जाता है।
एक्सपर्ट्स दे रहे हैं अस्थिरता की चेतावनी
हालांकि, एक्सपर्ट्स शॉर्ट से मीडियम टर्म में सोने के भाव में अस्थिरता (volatility) बने रहने की चेतावनी दे रहे हैं। हालिया कीमतों में उतार-चढ़ाव दिखाता है कि कैसे भू-राजनीतिक घटनाएं, लिक्विडिटी की जरूरत, डॉलर की मजबूती और ब्याज दरें बढ़ने की उम्मीदें कीमतों में तेज गिरावट ला सकती हैं। मजबूत अमेरिकी डॉलर, जो DXY इंडेक्स पर लगभग 98.38 पर है, और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें सोने की ऊपरी बढ़त को सीमित कर रही हैं। मार्च 2026 में अमेरिका में कोर इन्फ्लेशन (Core Inflation) 2.6% रहने के बावजूद, ऊंची ऊर्जा कीमतों के कारण फेडरल रिजर्व सख्त मौद्रिक नीति अपना सकता है, जो सोने की चढ़ाई को मुश्किल बना सकता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि जल्द ही लगातार तेजी के बजाय भावों में उथल-पुथल जारी रहने की संभावना है। इस दौरान सोना $4,600 से $4,800 प्रति औंस के बीच कारोबार कर सकता है।
आगे क्या? महंगाई से बचाव और सेंट्रल बैंकों की भूमिका अहम
भविष्य को देखें तो, सेंट्रल बैंकों की तरफ से जारी मांग सोने की कीमतों को सहारा देती रहेगी। माना जा रहा है कि 2026 तक खरीददारी जारी रहेगी। यह संस्थागत मांग (institutional demand) शॉर्ट-टर्म के दबाव को झेलने में मदद करेगी। महंगाई का सामना करने के लिए सोने की भूमिका भी और बढ़ेगी, क्योंकि महंगाई दरें ऊंची बनी रहने की उम्मीद है। एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि 2026-27 तक सोने का औसत भाव $5,000 प्रति औंस से ऊपर जा सकता है, और कुछ अनुमानों के मुताबिक यह और भी ऊपर जा सकता है। भविष्य में सोने की चाल डॉलर की मजबूती, लगातार महंगाई और जारी भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच संतुलन पर निर्भर करेगी।