US से आ रहे संकेतों के बीच सोने की कीमतों में बड़ी सुस्ती देखी जा रही है। फेडरल रिजर्व की सख्त नीतियों की आशंकाओं के चलते Gold के दाम **2 हफ्ते** के निचले स्तर पर आ गए हैं, जिसका असर भारतीय बाजार पर भी साफ दिख रहा है।
सोने की कीमतों में वैश्विक और घरेलू स्तर पर तेज गिरावट दर्ज की गई है। निवेशक अमेरिका के आगामी लेबर मार्केट डेटा, खासकर नॉन-फार्म पेरोल रिपोर्ट को लेकर खासे सतर्क हैं, क्योंकि इसका सीधा असर अमेरिकी फेडरल रिजर्व की भविष्य की ब्याज दर नीति पर पड़ेगा।
फेड पॉलिसी का असर
सोने की कीमतों में गिरावट की मुख्य वजह ब्याज दरों को लेकर बदला हुआ सेंटीमेंट है। चूंकि सोने पर कोई ब्याज नहीं मिलता, इसलिए जब अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ती हैं या बढ़ने की उम्मीद होती है, तो निवेशक सरकारी बॉन्ड्स जैसे विकल्पों को चुनते हैं। फेडरल रिजर्व के चेयर Kevin Warsh के हालिया संकेतों ने बाजार में हलचल मचा दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर महंगाई कम नहीं होती है, तो दरों में और बढ़ोतरी की जा सकती है। सितंबर 2026 तक ब्याज दरें बढ़ने की संभावना अब बाजार में करीब 66% तक पहुंच गई है।
जैसे-जैसे बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी होती है, सुरक्षित निवेश के रूप में सोने का आकर्षण कम हो जाता है। यही कारण है कि ट्रेडर्स अपनी गोल्ड पोजीशन को कम कर रहे हैं, जिससे कीमतों पर दबाव बना हुआ है।
भारतीय बाजारों पर असर
घरेलू कमोडिटी बाजार में भी इसका असर स्पष्ट दिखा। MCX पर अक्टूबर डिलीवरी वाले गोल्ड फ्यूचर्स में 1.06% की गिरावट आई और यह ₹1,50,123 प्रति 10 ग्राम पर बंद हुआ। वहीं, चांदी के दाम भी 1.38% गिरकर ₹2,32,197 प्रति किलोग्राम पर पहुंच गए। यह गिरावट दर्शाती है कि भारतीय प्रीशियस मेटल मार्केट अमेरिकी मैक्रो-इकोनॉमिक संकेतों के प्रति कितना संवेदनशील है।
जियो-पॉलिटिकल और इकोनॉमिक रिस्क
हालांकि सोना हमेशा से संकट के समय सुरक्षित निवेश माना जाता रहा है, लेकिन वर्तमान में इकोनॉमिक फैक्टर्स भारी पड़ रहे हैं। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के कारण एनर्जी मार्केट में अस्थिरता है, लेकिन महंगाई के डर से ज्यादा फिलहाल ब्याज दरों का डर निवेशकों पर हावी है। आने वाले दिनों में US पेरोल और एम्प्लॉयमेंट डेटा पर बाजार की नजरें टिकी होंगी, जो यह तय करेंगे कि फेडरल रिजर्व अपनी आक्रामक नीति पर कायम रहेगा या रुख में नरमी लाएगा।
