अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते और होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की खबरों के बीच सोने की कीमतों में **2.5%** से अधिक की तेजी आई है। दाम **$4,300** प्रति औंस के पार निकल गए हैं। इस समझौते से महंगाई और ब्याज दरें बढ़ने की उम्मीदें कम हुई हैं, जिससे सोने जैसे बिना यील्ड वाले एसेट्स की मांग बढ़ी है। भारत में MCX पर अगस्त डिलीवरी वाले गोल्ड फ्यूचर **1.7%** चढ़कर **₹153,135** पर पहुंच गए।
क्या हुआ?
सोमवार को सोने की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखा गया, जो $4,300 प्रति औंस के स्तर को पार कर गया। यह 2.5% से अधिक की तेजी अमेरिका और ईरान के बीच नए शांति समझौते की खबरों के बाद आई है। इस डील का मकसद तनाव खत्म करना और तेल के लिए महत्वपूर्ण वैश्विक शिपिंग रूट, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को फिर से खोलना है। इस खबर का कमोडिटी और करेंसी मार्केट पर बड़ा असर पड़ा है। कच्चे तेल की कीमतों में करीब 4% की गिरावट आई, वहीं डॉलर इंडेक्स लगभग 99.5 पर नरम पड़ गया।
निवेशक क्यों लगा रहे ब्याज दरों पर दांव?
वैसे तो सोना हमेशा से भू-राजनीतिक तनाव के समय सुरक्षित निवेश माना जाता रहा है, लेकिन इस बार बाजार की चाल आर्थिक उम्मीदों में आए बदलाव से प्रेरित है। सोना एक नॉन-यील्डिंग एसेट है, यानी इससे न तो कोई ब्याज मिलता है और न ही डिविडेंड। जब केंद्रीय बैंक ब्याज दरें ऊंची रखते हैं, तो सोने जैसे एसेट को रखने की अपॉर्चुनिटी कॉस्ट बढ़ जाती है।
अमेरिका-ईरान समझौते से यह उम्मीद जगी है कि महंगाई, जो आंशिक रूप से संघर्ष के कारण बढ़े तेल की कीमतों से बढ़ी थी, स्थिर हो सकती है। अगर महंगाई कम होती है, तो फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) और अन्य केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की उम्मीदें कम हो सकती हैं। इससे सोने के लिए अनुकूल माहौल बनता है, क्योंकि कम ब्याज दरों पर बॉन्ड जैसी यील्ड देने वाली संपत्तियों की तुलना में सोना रखना सस्ता हो जाता है।
भारतीय बाजार की प्रतिक्रिया
भारत में, इसका असर मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर साफ दिखा। अगस्त 2026 डिलीवरी वाले गोल्ड फ्यूचर 1.7% की बढ़त के साथ ₹153,135 पर पहुंच गए। भारतीय निवेशक अक्सर वैश्विक कीमतों और करेंसी की चाल पर नजर रखते हैं, क्योंकि सोना भारत के लिए एक प्रमुख आयात वस्तु है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डॉलर के कमजोर होने से आम तौर पर घरेलू सोने की कीमतों में वृद्धि वैश्विक डॉलर-आधारित चाल की तुलना में अधिक मामूली रहती है।
इस तेजी के पीछे के जोखिम
बाजार ने शांति समझौते पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है, लेकिन निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि यह तेजी भू-राजनीतिक स्थिरता पर बहुत निर्भर करती है। भू-राजनीतिक समझौते नाजुक हो सकते हैं। अगर शांति प्रक्रिया में कोई बाधा आती है या आर्थिक संकेतक दिखाते हैं कि महंगाई अभी भी बनी हुई है, तो बाजार केंद्रीय बैंकों की ब्याज दर नीतियों के बारे में अपनी उम्मीदों का तेजी से पुनर्मूल्यांकन कर सकता है।
जेपी मॉर्गन (J.P. Morgan) के विश्लेषकों ने साल के अंत तक सोने के लिए $6,000 प्रति औंस तक के महत्वाकांक्षी लक्ष्य सुझाए हैं। हालांकि, ये अनुमान भू-राजनीतिक तनावों के स्थायी समाधान और प्रमुख केंद्रीय बैंकों के विशिष्ट नीतिगत फैसलों पर बहुत अधिक निर्भर करते हैं। यदि फेडरल रिजर्व राजनयिक प्रगति के बावजूद आक्रामक रुख बनाए रखता है, तो सोने की कीमतों को मिलने वाला समर्थन कम हो सकता है।
निवेशकों को आगे क्या देखना चाहिए?
निवेशकों को शांति समझौते के कार्यान्वयन और होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से तेल शिपिंग पर इसके वास्तविक प्रभाव के बारे में आधिकारिक बयानों पर नजर रखनी चाहिए। इसके अलावा, फेडरल रिजर्व और अन्य प्रमुख केंद्रीय बैंकों की आगामी नीतिगत बैठकें महत्वपूर्ण होंगी। नीति में कोई भी विचलन - जैसे कि वैश्विक महंगाई के रुझानों के बावजूद स्थानीय मुद्रा की कमजोरी से लड़ने के लिए केंद्रीय बैंक द्वारा दरें बढ़ाना - सोने की गति को प्रभावित कर सकता है। अंत में, यूएस डॉलर इंडेक्स और वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों पर नजर रखने से यह सुराग मिलेगा कि वर्तमान महंगाई-घटाने की कहानी कितनी मजबूत है।
