कमजोर अमेरिकी एम्प्लॉयमेंट डेटा के बाद पिछले चार दिनों से सोना और चांदी की कीमतों में तेजी देखी जा रही है। इस बदलाव से फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की उम्मीदें कम हुई हैं, जिससे बुलियन जैसी नॉन-यील्डिंग एसेट्स (non-yielding assets) ग्लोबल निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक हो गई हैं। भारत में फिजिकल डिमांड (physical demand) कीमतों के उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील बनी हुई है।
सोने में लगातार चौथे दिन तेजी
सोने और चांदी की कीमती धातुओं की कीमतों में सोमवार, 6 जुलाई, 2026 को लगातार चौथे कारोबारी सत्र में बढ़त दर्ज की गई। सोना लगभग $4,180 प्रति औंस के स्तर पर पहुंच गया, जो 23 जून के बाद का उच्चतम स्तर है। इसी तरह, चांदी की कीमत में 0.2% की बढ़ोतरी देखी गई और यह लगभग $62.57 प्रति औंस पर कारोबार कर रही है।
अमेरिकी लेबर मार्केट डेटा का असर
कीमती धातुओं में आई इस तेजी की मुख्य वजह अमेरिकी लेबर मार्केट (US labor market) का ठंडा पड़ना है। जून के लिए जारी आंकड़ों में जॉब क्रिएशन (job creation) में स्पष्ट मंदी देखी गई, और पिछले दो महीनों के आंकड़े भी संशोधित किए गए हैं। निवेशकों के लिए यह एक महत्वपूर्ण संकेत है क्योंकि अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Federal Reserve) की ब्याज दर नीति सोने की कीमतों को काफी प्रभावित करती है। जब केंद्रीय बैंक ब्याज दरों को स्थिर रखने या घटाने की उम्मीद करता है, तो सोने की मांग बढ़ जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि सोने पर कोई ब्याज नहीं मिलता, इसलिए कम या गिरती दरों पर यह बॉन्ड जैसी ब्याज देने वाली संपत्तियों का एक बेहतर विकल्प बन जाता है। CME FedWatch Tool के हालिया आंकड़ों के अनुसार, अब बाजार में आगे ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना 50% से भी कम है, जिसने सोने और चांदी की कीमतों को सहारा दिया है।
भू-राजनीतिक और आर्थिक कारक
ब्याज दरों के अलावा, अनिश्चितता के समय में सोना अक्सर एक सुरक्षित निवेश (safe-haven asset) के रूप में देखा जाता है। अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक बातचीत, जिसकी मध्यस्थता कतर कर रहा है, व्यापारियों के लिए रुचि का एक प्रमुख बिंदु बनी हुई है। तनाव में किसी भी तरह की कमी या इन वार्ताओं में सकारात्मक प्रगति बाजार की भावना को प्रभावित कर सकती है, हालांकि भू-राजनीतिक अस्थिरता आम तौर पर निवेशकों को सोना रखने के लिए प्रोत्साहित करती है।
आगे देखते हुए, बाजार सहभागियों की निगाहें कई आगामी अमेरिकी आर्थिक रिपोर्टों पर टिकी हैं। ट्रेड बैलेंस (trade balance) के आंकड़े, आगामी FOMC मीटिंग मिनट्स (FOMC meeting minutes), और साप्ताहिक जॉबलेस क्लेम्स (weekly jobless claims) जैसे प्रमुख अपडेट निकट भविष्य में सोने की कीमतों की दिशा तय करने की उम्मीद है। ये रिपोर्टें अमेरिकी अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य और ब्याज दरों के भविष्य के बारे में और स्पष्टता प्रदान करेंगी।
भारत में फिजिकल डिमांड का हाल
जहां वैश्विक कारक कीमतों को बढ़ा रहे हैं, वहीं स्थानीय बाजारों में भी इसका असर दिख रहा है। भारत में फिजिकल गोल्ड डिमांड (physical gold demand) में थोड़ी बढ़ोतरी हुई थी, लेकिन शुक्रवार को कीमतों के बढ़ने के साथ इसमें नरमी के संकेत दिखे। इसके विपरीत, चीन में सोने की खरीदारी में थोड़ी सुधार देखा गया है। भारतीय निवेशकों के लिए, वैश्विक कीमतों में बढ़ोतरी का मतलब अक्सर घरेलू लागत का बढ़ना होता है, जो फिजिकल खरीदारी की मांग को अस्थायी रूप से दबा सकता है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की चाल पर भी नजर रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि कमजोर रुपया भारत में सोने के आयात की लागत को और बढ़ा सकता है।
